बूझत कृपानिधि कुसल भरतहि बचन बेगि न आवई॥ सुनु सिवा सो सुख बचन मन ते भिन्न जान जो पावई॥ अब कुसल कौसलनाथ आरत जानि जन दरसन दियो। बूड़त बिरह बारीस कृपानिधान मोहि कर गहि लियो॥2॥
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