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इंटरनेट पर श्रीरामजी का सबसे बड़ा विश्वकोश | RamCharitManas Ramayana in Hindi English | रामचरितमानस रामायण हिंदी अनुवाद अर्थ सहित

Adi ParvaMahabharat

श्रीमहाभारतम् आदिपर्व सप्तमोऽध्यायः

Spread the Glory of Sri SitaRam!

॥ श्रीहरिः ।।
श्रीगणेशाय नमः
॥ श्रीवेदव्यासाय नमः ॥
श्रीमहाभारतम्
आदिपर्व
सप्तमोऽध्यायः

शापसे कुपित हुए अग्निदेवका अदृश्य होना और ब्रह्माजीका उनके शापको संकुचित करके उन्हें प्रसन्न करना

सौतिरुवाच
शप्तस्तु भृगुणा वह्निः क्रुद्धो वाक्यमथाब्रवीत् ।
किमिदं साहसं ब्रह्मन् कृतवानसि मां प्रति ॥ १ ॥

उग्रश्रवाजी कहते हैं- महर्षि भृगुके शाप देनेपर अग्निदेवने कुपित होकर यह बात कही- ‘ब्रह्मन् ! तुमने मुझे शाप देनेका यह दुस्साहसपूर्ण कार्य क्यों किया हे?’ ।। १ ।।

धर्मे प्रयतमानस्य सत्यं च वदतः समम् ।
पृष्टो यदब्रवं सत्यं व्यभिचारोऽत्र को मम ॥ २ ॥

‘मैं सदा धर्मके लिये प्रयत्नशील रहता और सत्य एवं पक्षपातशून्य वचन बोलता हूँ; अतः उस राक्षसके पूछनेपर यदि मैंने सच्ची बात कह दी तो इसमें मेरा क्या अपराध है? ।। २ ।।

पृष्टो हि साक्षी यः साक्ष्यं जानानोऽप्यन्यथा वदेत् ।
स पूर्वानात्मनः सप्त कुले हन्यात् तथा परान् ।। ३ ।।

‘जो साक्षी किसी बातको ठीक-ठीक जानते हुए भी पूछनेपर कुछ का कुछ कह देता – झूठ बोलता है, वह अपने कुलमें पहले और पीछेकी सात-सात पीढ़ियोंका नाश करता – उन्हें नरकमें ढकेलता है ।। ३ ।।

यश्च कार्यार्थतत्त्वज्ञो जानानोऽपि न भाषते ।
सोऽपि तेनैव पापेन लिप्यते नात्र संशयः ।। ४ ।।


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Shiv

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