श्रीमहाभारतम् आदिपर्व सप्तमोऽध्यायः
॥ श्रीहरिः ।।
श्रीगणेशाय नमः
॥ श्रीवेदव्यासाय नमः ॥
श्रीमहाभारतम्
आदिपर्व
सप्तमोऽध्यायः
शापसे कुपित हुए अग्निदेवका अदृश्य होना और ब्रह्माजीका उनके शापको संकुचित करके उन्हें प्रसन्न करना
सौतिरुवाच
शप्तस्तु भृगुणा वह्निः क्रुद्धो वाक्यमथाब्रवीत् ।
किमिदं साहसं ब्रह्मन् कृतवानसि मां प्रति ॥ १ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं- महर्षि भृगुके शाप देनेपर अग्निदेवने कुपित होकर यह बात कही- ‘ब्रह्मन् ! तुमने मुझे शाप देनेका यह दुस्साहसपूर्ण कार्य क्यों किया हे?’ ।। १ ।।
धर्मे प्रयतमानस्य सत्यं च वदतः समम् ।
पृष्टो यदब्रवं सत्यं व्यभिचारोऽत्र को मम ॥ २ ॥
‘मैं सदा धर्मके लिये प्रयत्नशील रहता और सत्य एवं पक्षपातशून्य वचन बोलता हूँ; अतः उस राक्षसके पूछनेपर यदि मैंने सच्ची बात कह दी तो इसमें मेरा क्या अपराध है? ।। २ ।।
पृष्टो हि साक्षी यः साक्ष्यं जानानोऽप्यन्यथा वदेत् ।
स पूर्वानात्मनः सप्त कुले हन्यात् तथा परान् ।। ३ ।।
‘जो साक्षी किसी बातको ठीक-ठीक जानते हुए भी पूछनेपर कुछ का कुछ कह देता – झूठ बोलता है, वह अपने कुलमें पहले और पीछेकी सात-सात पीढ़ियोंका नाश करता – उन्हें नरकमें ढकेलता है ।। ३ ।।
यश्च कार्यार्थतत्त्वज्ञो जानानोऽपि न भाषते ।
सोऽपि तेनैव पापेन लिप्यते नात्र संशयः ।। ४ ।।