श्रीमहाभारतम् आदिपर्व अष्टाविंशोऽध्यायः
॥ श्रीहरिः ।।
श्रीगणेशाय नमः
॥ श्रीवेदव्यासाय नमः ॥
श्रीमहाभारतम्
आदिपर्व
अष्टाविंशोऽध्यायः
गरुडका अमृतके लिये जाना और अपनी माताकी आज्ञाके अनुसार निषादोंका भक्षण करना
सौतिरुवाच
इत्युक्तो गरुडः सर्वैस्ततो मातरमब्रवीत् ।
गच्छाम्यमृतमाहर्तुं भक्ष्यमिच्छामि वेदितुम् ॥ १॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं— सर्पोंकी यह बात सुनकर गरुड अपनी मातासे बोले – ‘माँ ! मैं अमृत लानेके लिये जा रहा हूँ, किंतु मेरे लिये भोजन-सामग्री क्या होगी ? यह मैं जानना चाहता हूँ’ ।। १ ।।
विनतोवाच
समुद्रकुक्षावेकान्ते निषादालयमुत्तमम् ।
निषादानां सहस्राणि तान् भुक्त्वामृतमानय ॥ २ ॥
विताने कहा – समुद्र बीचमें एक टापू है, जिसके एकान्त प्रदेशमें निषादों जीवहिंसकों) का निवास है । वहाँ सहस्रों निषाद रहते हैं। उन्हींको मारकर खा लो और अमृत ले आओ ।। २ ।
न च ते ब्राह्मणं हन्तुं कार्या बुद्धिः कथंचन ।
अवध्यः सर्वभूतानां ब्राह्मणो ह्यनलोपमः ॥ ३ ॥
किंतु तुम्हें किसी प्रकार ब्राह्मणको मारनेका विचार नहीं करना चाहिये, क्योंकि ब्राह्मण समस्त प्राणियोंके लिये अवध्य है। वह अग्निके समान दाहक होता है ।। ३ ।।
अग्निरर्को विषं शस्त्रं विप्रो भवति कोपितः ।
गुरुर्हि सर्वभूतानां ब्राह्मणः परिकीर्तितः ।। ४ ।।
कुपित किया हुआ ब्राह्मण अग्नि, सूर्य, विष एवं शस्त्रके समान भयंकर होता है। ब्राह्मणको समस्त प्राणियोंका गुरु कहा गया है ।। ४ ॥
एवमादिस्वरूपैस्तु सतां वै ब्राह्मणो मतः ।
स ते तात न हन्तव्यः संक्रुद्धेनापि सर्वथा ॥ ५॥
इन्हीं रूपोंमें सत्पुरुषोंके लिये ब्राह्मण आदरणीय माना गया है। तात! तुम्हें क्रोध आ जाय तो भी ब्राह्मणकी हत्यासे सर्वथा दूर रहना चाहिये ।। ५ ।।
ब्राह्मणानामभिद्रोहो न कर्तव्यः कथंचन ।
न ह्येवमग्निर्नादित्यो भस्म कुर्यात् तथानघ ॥ ६ ॥
यथा कुर्यादभिक्रुद्धो ब्राह्मणः संशितव्रतः ।
तदेतैर्विविधैर्लिङ्गैस्त्वं विद्यास्तं द्विजोत्तमम् ॥ ७ ॥
भूतानामग्रभूर्विप्रो वर्णश्रेष्ठः पिता गुरुः ।
ब्राह्मणोंके साथ किसी प्रकार द्रोह नहीं करना चाहिये। अनघ ! कठोर व्रतका पालन करनेवाला ब्राह्मण क्रोधमें आनेपर अपराधीको जिस प्रकार जलाकर भस्म कर देता है, उस तरह अग्नि और सूर्य भी नहीं जला सकते। इस प्रकार विविध चिह्नोंके द्वारा तुम्हें ब्राह्मणको पहचान लेना चाहिये। ब्राह्मण समस्त प्राणियोंका अग्रज, सब वर्णोंमें श्रेष्ठ, पिता और गुरु है ।। ६-७ ।।
गरुड उवाच
किंरूपो ब्राह्मणो मातः किंशीलः किंपराक्रमः ॥ ८ ॥
गरुडने पूछा—माँ! ब्राह्मणका रूप कैसा होता है? उसका शील स्वभाव कैसा है ? तथा उसमें कौन-सा पराक्रम है ।। ८ ।।
किंस्विदग्निनिभो भाति किंस्वित् सौम्यप्रदर्शनः ।
यथाहमभिजानीयां ब्राह्मणं लक्षणैः शुभैः ।। ९ ।।
तन्मे कारणतो मातः पृच्छतो वक्तुमर्हसि ।
वह देखनेमें अग्नि-जैसा जान पड़ता है? अथवा सौम्य दिखायी देता है ? माँ! जिस प्रकार शुभ लक्षणोंद्वारा मैं ब्राह्मणको पहचान सकूँ, वह सब उपाय मुझे बताओ ।। ९३ ।।
विनतोवाच
यस्ते कण्ठमनुप्राप्तो निगीर्णं बडिशं यथा ।। १० ।।
दहेदङ्गारवत् पुत्र तं विद्या ब्राह्मणर्षभम् ।
विप्रस्त्वया न हन्तव्यः संक्रुद्धेनापि सर्वदा ॥ ११ ॥
विनता बोली- बेटा! जो तुम्हारे कण्ठमें पड़नेपर अंगारकी तरह जलाने लगे और मानो बंसीका काँटा निगल लिया गया हो, इस प्रकार कष्ट देने लगे, उसे वर्णोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण समझना। क्रोधमें भरे होनेपर भी तुम्हें ब्रह्महत्या नहीं करनी चाहिये ।। १०-११ ।।
प्रोवाच चैनं विनता पुत्रहार्दादिदं वचः ।
जठरे न च जीर्येद् यस्तं जानीहि द्विजोत्तमम् ॥ १२ ॥
विनताने पुत्र के प्रति स्नेह होनेके कारण पुनः इस प्रकार कहा- ‘बेटा! जो तुम्हारे पेटमें पच न सके, उसे ब्राह्मण जानना’ ।। १२ ।।