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इंटरनेट पर श्रीरामजी का सबसे बड़ा विश्वकोश | RamCharitManas Ramayana in Hindi English | रामचरितमानस रामायण हिंदी अनुवाद अर्थ सहित

Adi ParvaMahabharat

श्रीमहाभारतम् आदिपर्व पञ्चविंशोऽध्यायः

Spread the Glory of Sri SitaRam!

॥ श्रीहरिः ।।
श्रीगणेशाय नमः
॥ श्रीवेदव्यासाय नमः ॥
श्रीमहाभारतम्
आदिपर्व
पञ्चविंशोऽध्यायः

सूर्य तापसे मूर्च्छित हुए सर्पोंकी रक्षाके लिये कद्रूद्वारा इन्द्रदेवकी स्तुति

सौतिरुवाच
ततः कामगमः पक्षी महावीर्यो महाबलः ।
मातुरन्तिकमागच्छत् परं पारं महोदधेः ।। १ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं— शौनकादि महर्षियो ! तदनन्तर इच्छानुसार गमन करनेवाले महान् पराक्रमी तथा महाबली गरुड समुद्रके दूसरे पार अपनी माताके समीप आये ।। १ ।।

यत्र सा विनता तस्मिन् पणितेन पराजिता ।
अतीव दुःखसंतप्ता दासीभावमुपागता ।। २ ॥

जहाँ उनकी माता विनता बाजी हार जानेसे दासी भावको प्राप्त हो अत्यन्त दुःखसे संतप्त रहती थीं ॥ २॥

ततः कदाचिद् विनतां प्रणतां पुत्रसंनिधौ ।
काले चाहूय वचनं कद्रूरिदमभाषत ।। ३ ।।

एक दिन अपने पुत्रके समीप बैठी हुई विनय-शील विनताको किसी समय बुलाकर कद्रूने यह बात कही – ॥ ३ ॥

नागानामालयं भद्रे सुरम्यं चारुदर्शनम् ।
समुद्रकुक्षावेकान्ते तत्र मां विनते नय ।। ४ ।।

‘कल्याणी विनते! समुद्रके भीतर निर्जन प्रदेशमें एक बहुत रमणीय तथा देखने में – अत्यन्त मनोहर नागोंका निवासस्थान है। तू वहाँ मुझे ले चल’ ।। ४ ।।

ततः सुपर्णमाता तामवहत् सर्पमातरम् ।
पन्नगान् गरुडश्चापि मातुर्वचनचोदितः ।। ५ ।
।
तब गरुडकी माता विनता सर्पोंकी माता कद्रूको अपनी पीठपर ढोने लगी। इधर माताकी आज्ञासे गरुड भी सर्पोंको अपनी पीठपर चढ़ाकर ले चले ।। ५ ।।

सूर्यमभितो याति वैनतेयो विहंगमः ।
सूर्यरश्मिप्रतप्ताश्च मूर्च्छिताः पन्नगाभवन् ।। ६ ॥

पक्षिराज गरुड आकाशमें सूर्यके निकट होकर चलने लगे। अतः सर्प सूर्यकी किरणोंसे संतप्त हो मूर्च्छित हो गये ।। ६ ।।

तदवस्थान् सुतान् दृष्ट्वा कद्रूः शक्रमथास्तुवत् ।
नमस्ते सर्वदेवेश नमस्ते बलसूदन ।। ७ ।।

अपने पुत्रोंको इस दशामें देखकर कद्रू इन्द्रकी स्तुति करने लगी- ‘सम्पूर्ण देवताओंके ईश्वर! तुम्हें नमस्कार है। बलसूदन! तुम्हें नमस्कार है ।। ७ ।।

नमुचिघ्न नमस्तेऽस्तु सहस्राक्ष शचीपते ।
सर्पाणां सूर्यतप्तानां वारिणा त्वं प्लवो भव ॥ ८ ॥

‘सहस्र नेत्रोंवाले नमुचिनाशन! शचीपते! तुम्हें नमस्कार है। तुम सूर्यके तापसे संतप्त हुए सर्पोंको जलसे नहलाकर नौकाकी भाँति उनके रक्षक हो जाओ ।। ८ ।।

त्वमेव परमं त्राणमस्माकममरोत्तम ।
ईशो ह्यसि पयः स्रष्टुं त्वमनल्पं पुरन्दर ।। ९ ॥

‘अमरोत्तम! तुम्हीं हमारे सबसे बड़े रक्षक हो । पुरन्दर ! तुम अधिक-से-अधिक जल -बरसानेकी शक्ति रखते हो ।। ९ ।।

त्वमेव मेघस्त्वं वायुस्त्वमग्निर्विद्युतोऽम्बरे ।
त्वमभ्रगणविक्षेप्ता त्वामेवाहुर्महाघनम् ।। १० ।।

‘तुम्हीं मेघ हो, तुम्हीं वायु हो और तुम्हीं आकाशमें बिजली बनकर प्रकाशित होते हो। तुम्हीं बादलोंको छिन्न-भिन्न करनेवाले हो और विद्वान् पुरुष तुम्हें ही महामेघ कहते हैं ।। १० ।।

त्वं वज्रमतुलं घोरं घोषवांस्त्वं बलाहकः ।
स्रष्टा त्वमेव लोकानां संहर्ता चापराजितः ॥ ११ ॥

‘संसारमें जिसकी कहीं तुलना नहीं है, वह भयानक वज्र तुम्हीं हो, तुम्हीं भयंकर गर्जना करनेवाले बलाहक (प्रलयकालीन मेघ ) हो। तुम्हीं सम्पूर्ण लोकोंकी सृष्टि और संहार करनेवाले हो। तुम कभी परास्त नहीं होते ।। ११ ।।

त्वं ज्योतिः सर्वभूतानां त्वमादित्यो विभावसुः ।
त्वं महद्भूतमाश्चर्यं त्वं राजा त्वं सुरोत्तमः ।। १२ ।।

‘तुम्हीं समस्त प्राणियोंकी ज्योति हो । सूर्य और अग्नि भी तुम्हीं हो। तुम आश्चर्यमय महान् भूत हो, तुम राजा हो और तुम देवताओंमें सबसे श्रेष्ठ हो ।। १२ ।।

त्वं विष्णुस्त्वं सहस्राक्षस्त्वं देवस्त्वं परायणम् ।
त्वं सर्वममृतं देव त्वं सोमः परमार्चितः ।। १३ ।।

‘तुम्हीं सर्वव्यापी विष्णु, सहस्रलोचन इन्द्र, द्युतिमान् देवता और सबके परम आश्रय हो देव! तुम्हीं सब कुछ हो। तुम्हीं अमृत हो और तुम्हीं परम पूजित सोम हो ।। १३ ।।

त्वं मुहूर्तस्तिथिस्त्वं च त्वं लवस्त्वं पुनः क्षणः ।
शुक्लस्त्वं बहुलस्त्वं च कला काष्ठा त्रुटिस्तथा ।
संवत्सरर्तवो मासा रजन्यश्च दिनानि च ।। १४ ।

‘तुम मुहूर्त हो, तुम्हीं तिथि हो, तुम्हीं लव तथा तुम्हीं क्षण हो । शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष भी तुमसे भिन्न नहीं हैं। कला, काष्ठा और त्रुटि सब तुम्हारे ही स्वरूप हैं। संवत्सर, ऋतु, मास, रात्रि तथा दिन भी तुम्हीं हो । १४ ।।

त्वमुत्तमा सगिरिवना वसुन्धरा
सभास्करं वितिमिरमम्बरं तथा ।
महोदधिः सतिमितिमिंगिलस्तथा
महोर्मिमान् बहुमकरो झषाकुलः ।। १५ ।।

‘तुम्हीं पर्वत और वनोंसहित उत्तम वसुन्धरा हो और तुम्हीं अन्धकाररहित एवं सूर्यसहित आकाश हो। तिमि और तिमिंगिलोंसे भरपूर, बहुतेरे मगरों और मत्स्योंसे व्याप्त तथा उत्ताल तरंगों से सुशोभित महासागर भी तुम्हीं हो ।। १५ ।।

महायशास्त्वमिति सदाभिपूज्यसे
मनीषिभिर्मुदितमना महर्षिभिः ।
अभिष्टुतः पिबसि च सोममध्वरे
वषट्कृतान्यपि च हवींषि भूतये ।। १६ ।।

‘तुम महान् यशस्वी हो। ऐसा समझकर मनीषी पुरुष सदा तुम्हारी पूजा करते हैं। महर्षिगण निरन्तर तुम्हारा स्तवन करते हैं। तुम यजमानकी अभीष्टसिद्धि करनेके लिये यज्ञमें मुदित मनसे सोमरस पीते हो और वषट्कारपूर्वक समर्पित किये हुए हविष्य भी ग्रहण करते हो ।। १६ ।।

त्वं विप्रैः सततमिहेज्यसे फलार्थं
वेदाङ्गेष्वतुलबलौघ गीयसे च ।
त्वद्धेतोर्यजनपरायणा द्विजेन्द्रा
वेदाङ्गान्यभिगमयन्ति सर्वयत्नैः ।। १७ ।।

‘इस जगत्में अभीष्ट फलकी प्राप्तिके लिये विप्रगण तुम्हारी पूजा करते हैं। अतुलित बलके भण्डार इन्द्र! वेदांगोंमें भी तुम्हारी ही महिमाका गान किया गया है। यज्ञपरायण श्रेष्ठ द्विज तुम्हारी प्राप्तिके लिये ही सर्वथा प्रयत्न करके वेदांगोंका ज्ञान प्राप्त करते हैं (यहाँ कके द्वारा ईश्वररूपसे इन्द्रकी स्तुति की गयी है)’ ।। १७ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सौपर्णे पञ्चविंशोऽध्यायः ।। २५ ।।


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Shiv

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