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इंटरनेट पर श्रीरामजी का सबसे बड़ा विश्वकोश | RamCharitManas Ramayana in Hindi English | रामचरितमानस रामायण हिंदी अनुवाद अर्थ सहित

Adi ParvaMahabharat

श्रीमहाभारतम् आदिपर्व षष्ठोऽध्यायः

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॥ श्रीहरिः ।।
श्रीगणेशाय नमः
॥ श्रीवेदव्यासाय नमः ॥
श्रीमहाभारतम्
आदिपर्व
षष्ठोऽध्यायः

महर्षि च्यवनका जन्म, उनके तेजसे पुलोमा राक्षसका भस्म होना तथा भृगुका अग्निदेवको शाप देना

सौतिरुवाच
अग्नेरथ वचः श्रुत्वा तद् रक्षः प्रजहार ताम् ।
ब्रह्मन् वराहरूपेण मनोमारुतरंहसा ।। १ ।

उग्रश्रवाजी कहते हैं – ब्रह्मन् ! अग्निका यह वचन सुनकर उस राक्षसने वराहका रूप धारण करके मन और वायुके समान वेगसे उसका अपहरण किया ।। १ ।।

ततः स गर्भो निवसन् कुक्षौ भृगुकुलोद्वह ।
रोषान्मातुश्च्युतः कुक्षेश्यवनस्तेन सोऽभवत् ॥ २ ॥

भृगुवंशशिरोमणे ! उस समय वह गर्भ जो अपनी माताकी कुक्षिमें निवास कर रहा था, अत्यन्त रोषके कारण योगबलसे माताके उदरसे च्युत होकर बाहर निकल आया । च्युत होनेके कारण ही उसका नाम च्यवन हुआ ।। २ ।।

तं दृष्ट्वा मातुरुदराच्च्युतमादित्यवर्चसम् ।
तद् रक्षो भस्मसाद्भूतं पपात परिमुच्य ताम् ॥ ३ ॥

माताके उदरसे च्युत होकर गिरे हुए उस सूर्यके समान तेजस्वी गर्भको देखते ही वह राक्षस पुलोमाको छोड़कर गिर पड़ा और तत्काल जलकर भस्म हो गया ।। ३ ।।

सा तमादाय सुश्रोणी ससार भृगुनन्दनम् ।
च्यवनं भार्गवं पुत्रं पुलोमा दुःखमूर्च्छिता ॥ ४ ॥

सुन्दर कटिप्रदेशवाली पुलोमा दुःखसे मूर्च्छित हो गयी और किसी तरह सँभलकर भृगुकुलको आनन्दित करनेवाले अपने पुत्र भार्गव च्यवनको गोदमें लेकर ब्रह्माजीके पास चली ।। ४ ।।

तां ददर्श स्वयं ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः ।
रुदतीं बाष्पपूर्णाक्षी भृगोर्भार्यामनिन्दिताम् ।। ५ ।।
सान्त्वयामास भगवान् वधूं ब्रह्मा पितामहः ।
अश्रुबिन्दूद्भवा तस्याः प्रावर्तत महानदी ।। ६ ॥

सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्माजीने स्वयं भृगुकी उस पतिव्रता पत्नीको रोती और नेत्रोंसे आँसू बहाती देखा। तब पितामह भगवान् ब्रह्माने अपनी पुत्रवधूको सान्त्वना दी- उसे धीरज बँधाया। उसके आँसुओंकी बूँदोंसे एक बहुत बड़ी नदी प्रकट हो गयी ।। ५-६ ।।

आवर्तन्ती सृतिं तस्या भृगोः पन्त्यास्तपस्विनः ।
तस्या मार्गं सृतवतीं दृष्ट्वा तु सरितं तदा ।। ७ ॥
नाम तस्यास्तदा नद्याश्चक्रे लोकपितामहः ।
वधूसरेति भगवांश्यवनस्याश्रमं प्रति ।। ८ ।।

वह नदी तपस्वी भृगुकी उस पत्नीके मार्गको आप्लावित किये हुए थी। उस समय लोकपितामह भगवान् ब्रह्माने पुलोमाके मार्गका अनुसरण करनेवाली उस नदीको देखकर उसका नाम वधूसरा रख दिया, जो च्यवनके आश्रमके पास प्रवाहित होती है ।। ७-८ ।।

स एव च्यवनो जज्ञे भृगोः पुत्रः प्रतापवान् ।
तं ददर्श पिता तत्र च्यवनं तां च भामिनीम् ।
स पुलोमा ततो भार्यां पप्रच्छ कुपितो भृगुः ।। ९ ।।

इस प्रकार भृगुपुत्र प्रतापी च्यवनका जन्म हुआ। तदनन्तर पिता भृगुने वहाँ अपने पुत्र च्यवन तथा पत्नी पुलोमाको देखा और सब बातें जानकर उन्होंने अपनी भार्या पुलोमासे कुपित होकर पूछा- ॥९॥

भृगुरुवाच
केनासि रक्षसे तस्मै कथिता त्वं जिहीर्षते ।
न हि त्वां वेद तद् रक्षो मद्भार्यां चारुहासिनीम् ॥ १० ॥

भृगु बोले- कल्याणी! तुम्हें हर लेनेकी इच्छासे आये हुए उस राक्षसको किसने तुम्हारा परिचय दे दिया? मनोहर मुसकानवाली मेरी पत्नी तुझ पुलोमाको वह राक्षस नहीं
जानता था ।। १० ।।

तत्त्वमाख्याहि तं ह्यद्य शप्तुमिच्छाम्यहं रुषा ।
बिभेति को न शापान्मे कस्य चायं व्यतिक्रमः ।। ११ ।।

प्रिये ! ठीक-ठीक बताओ। आज मैं कुपित होकर अपने उस अपराधीको शाप देना चाहता हूँ। कौन मेरे शापसे नहीं डरता है? किसके द्वारा यह अपराध हुआ है? ।। ११ ।।

पुलोमोवाच
अग्निना भगवंस्तस्मै रक्षसेऽहं निवेदिता ।
ततो मामनयद् रक्षः क्रोशन्तीं कुररीमिव ॥ १२ ॥

पुलोमा बोली – भगवन्! अग्निदेवने उस राक्षसको मेरा परिचय दे दिया। इससे कुररीकी भाँति विलाप करती हुई मुझ अबलाको वह राक्षस उठा ले गया ।। १२ ।।

साहं तव सुतस्यास्य तेजसा परिमोक्षिता ।
भस्मीभूतं च तद् रक्षो मामुत्सृज्य पपात वै ।। १३ ।।

आपके इस पुत्रके तेजसे मैं उस राक्षसके चंगुलसे छूट सकी हूँ। राक्षस मुझे छोड़कर गिरा और जलकर भस्म हो गया ।। १३ ।

सौतिरुवाच
इति श्रुत्वा पुलोमाया भृगुः परममन्युमान् ।
शशापाग्निमतिक्रुद्धः सर्वभक्षो भविष्यसि ॥ १४ ॥

उग्रश्रवाजी कहते हैं—पुलोमाका यह वचन सुनकर परम क्रोधी महर्षि भृगुका क्रोध और भी बढ़ गया। उन्होंने अग्निदेवको शाप दिया- ‘तुम सर्वभक्षी हो जाओगे’ ।। १४ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि पौलोमपर्वणि अग्निशापे षष्ठोऽध्यायः ।। ६ ।।


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Shiv

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