श्रीमहाभारतम् आदिपर्व (आस्तीकपर्व) चतुर्दशोऽध्यायः
॥ श्रीहरिः ।।
श्रीगणेशाय नमः
॥ श्रीवेदव्यासाय नमः ॥
श्रीमहाभारतम्
आदिपर्व
(आस्तीकपर्व)
चतुर्दशोऽध्यायः
जरत्कारुद्वारा वासुकिकी बहिनका पाणिग्रहण
सौतिरुवाच
ततो निवेशाय तदा स विप्रः संशितव्रतः ।
महीं चचार दारार्थी न च दारानविन्दत ॥ १॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं-तदनन्तर वे कठोर व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मण भार्याकी प्राप्तिके लिये इच्छुक होकर पृथ्वीपर सब ओर विचरने लगे; किंतु उन्हें पत्नीकी उपलब्धि नहीं हुई ।। १ ।।
स कदाचिद् वनं गत्वा विप्रः पितृवचः स्मरन् ।
चुक्रोश कन्याभिक्षार्थी तिस्रो वाचः शनैरिव ॥ २ ॥
एक दिन किसी वनमें जाकर विप्रवर जरत्कारुने पितरोंके वचनका स्मरण करके कन्याकी भिक्षाके लिये तीन बार धीरे-धीरे पुकार लगायी – ‘कोई भिक्षारूपमें कन्या दे
जाय’ ।। २ ।।
तं वासुकिः प्रत्यगृह्णादुद्यम्य भगिनीं तदा ।
नसतां प्रतिजग्राह न सनाम्नीति चिन्तयन् ।। ३ ।।
इसी समय नागराज वासुकि अपनी बहिनको लेकर मुनिकी सेवामें उपस्थित हो गये और बोले, ‘यह भिक्षा ग्रहण कीजिये।’ किंतु उन्होंने यह सोचकर कि शायद यह मेरे जैसे नामवाली न हो, उसे तत्काल ग्रहण नहीं किया ।। ३ ।।
सनाम्नीं चोद्यतां भार्यां गृह्णीयामिति तस्य हि ।
मनो निविष्टमभवज्जरत्कारोर्महात्मनः ।। ४ ।।
उन महात्मा जरत्कारुका मन इस बातपर स्थिर हो गया था कि मेरे जैसे नामवाली कन्या यदि उपलब्ध हो तो उसीको पत्नीरूपमें ग्रहण करूँ ।। ४ ॥
तमुवाच महाप्राज्ञो जरत्कारुर्महातपाः ।
किंनाम्नी भगिनीयं ते ब्रूहि सत्यं भुजंगम ॥ ५ ॥
ऐसा निश्चय करके परम बुद्धिमान् एवं महान् तपस्वी जरत्कारुने पूछा- ‘नागराज ! सच-सच बताओ, तुम्हारी इस बहिनका क्या नाम है?’ ।। ५ ।।
वासुवि
जरत्कारो जरत्कारुः स्वसेयमनुजा मम ।
प्रतिगृह्णीष्व भार्यार्थे मया दत्तां सुमध्यमाम् ।
त्वदर्थं रक्षिता पूर्वं प्रतीच्छेमां द्विजोत्तम ।। ६ ॥
वासुकिने कहा- जरत्कारो ! यह मेरी छोटी बहिन जरत्कारु नामसे ही प्रसिद्ध है। इस सुन्दर कटिप्रदेशवाली कुमारीको पत्नी बनानेके लिये मैंने स्वयं आपकी सेवामें समर्पित किया है। इसे स्वीकार कीजिये । द्विजश्रेष्ठ ! यह बहुत पहलेसे आपहीके लिये सुरक्षित रखी गयी है, अतः इसे ग्रहण करें ।। ६ ।।
एवमुक्त्वा ततः प्रादाद् भार्यार्थे वरवर्णिनीम् ।
स च तां प्रतिजग्राह विधिदृष्टेन कर्मणा ।। ७ ।।
ऐसा कहकर वासुकिने वह सुन्दरी कन्या मुनिको पत्नीरूपमें प्रदान की। मुनिने भी शास्त्रीय विधिके अनुसार उसका पाणिग्रहण किया ।। ७ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि वासुकिस्वसृवरणे चतुर्दशोऽध्यायः ।। १४ ।।