श्रीमहाभारतम् आदिपर्व (आस्तीकपर्व) षोडशोऽध्यायः
॥ श्रीहरिः ।।
श्रीगणेशाय नमः
॥ श्रीवेदव्यासाय नमः ॥
श्रीमहाभारतम्
आदिपर्व
(आस्तीकपर्व)
षोडशोऽध्यायः
कद्रू और विनताको कश्यपजीके वरदानसे अभीष्ट पुत्रोंकी प्राप्ति
शौनक उवाच
सौते त्वं कथयस्वेमां विस्तरेण कथां पुनः ।
आस्तीकस्य कवेः साधोः शुश्रूषा परमा हि नः ॥ १ ॥
शौनकजी बोले- सूतनन्दन! आप ज्ञानी महात्मा आस्तीककी इस कथाको पुनः विस्तारके साथ कहिये। हमें उसे सुननेके लिये बड़ी उत्कण्ठा है ।। १ ॥
मधुरं कथ्यते सौम्य श्लक्ष्णाक्षरपदं त्वया ।
प्रीयामहे भृशं तात पितेवेदं प्रभाषसे ।। २ ।।
सौम्य ! आप बड़ी मधुर कथा कहते हैं। उसका एक-एक अक्षर और एक-एक पद कोमल है। तात! इसे सुनकर हमें बड़ी प्रसन्नता होती है। आप अपने पिता लोमहर्षणकी भाँति ही प्रवचन कर रहे हैं ।। २ ।।
अस्मच्छुश्रूषणे नित्यं पिता हि निरतस्तव ।
आचष्टैतद् यथाख्यानं पिता ते त्वं तथा वद ।। ३ ॥
आपके पिता सदा हमलोगोंकी सेवामें लगे रहते थे। उन्होंने इस उपाख्यानको जिस प्रकार कहा है, उसी रूपमें आप भी कहिये ॥ ३ ॥
सौतिरुवाच
आयुष्मन्निदमाख्यानमास्तीकं कथयामि ते ।
यथाश्रुतं कथयतः सकाशाद् वै पितुर्मया ।। ४ ।।
उग्रश्रवाजीने कहा – आयुष्मन्! मैंने अपने कथावाचक पिताजीके मुखसे यह आस्तीककी कथा, जिस रूपमें सुनी है, उसी प्रकार आपसे कहता हूँ ।। ४ ॥
पुरा देवयुगे ब्रह्मन् प्रजापतिसुते शुभे ।
आस्तां भगिन्यौ रूपेण समुपेतेऽद्भुतेऽनघ ।। ५॥
ते भार्ये कश्यपस्यास्तां कद्रूश्च विनता च ह ।
प्रादात् ताभ्यां वरं प्रीतः प्रजापतिसमः पतिः ।। ६ ।।
कश्यपो धर्मपत्नीभ्यां मुदा परमया युतः ।
वरातिसर्गं श्रुत्वैवं कश्यपादुत्तमं च ते ।। ७ ।।
हर्षादप्रतिमां प्रीतिं प्रापतुः स्म वरस्त्रियौ ।
वव्रे कद्रूः सुतान् नागान् सहस्रं तुल्यवर्चसः ॥ ८ ॥
ब्रह्मन्! पहले सत्ययुगमें दक्ष प्रजापतिकी दो शुभलक्षणा कन्याएँ थीं- कद्रू और विनता। वे दोनों बहिनें रूप-सौन्दर्यसे सम्पन्न तथा अद्भुत थीं। अनघ ! उन दोनोंका विवाह महर्षि कश्यपजीके साथ हुआ था। एक दिन प्रजापति ब्रह्माजीके समान शक्तिशाली पति महर्षि कश्यपने अत्यन्त हर्षमें भरकर अपनी उन दोनों धर्मपत्नियोंको प्रसन्नतापूर्वक वर देते हुए कहा – ‘तुममें से जिसकी जो इच्छा हो वर माँग लो।’ इस प्रकार कश्यपजीसे उत्तम वरदान मिलनेकी बात सुनकर प्रसन्नताके कारण उन दोनों सुन्दरी स्त्रियोंको अनुपम आनन्द प्राप्त हुआ। कद्रूने समान तेजस्वी एक हजार नागोंको पुत्ररूपमें पानेका वर माँगा ।। ५-८ ।।
द्वौ पुत्रौ विनता वव्रे कद्रूपुत्राधिकौ बले ।
तेजसा वपुषा चैव विक्रमेणाधिकौ च तौ ।। ९ ।
विनताने बल, तेज, शरीर तथा पराक्रममें कद्रूके पुत्रोंसे श्रेष्ठ केवल दो ही पुत्र माँगे ।। ९ ।।
तस्यै भर्ता वरं प्रादादत्यर्थं पुत्रमीप्सितम् ।
एवमस्त्विति तं चाह कश्यपं विनता तदा ।। १० ।।
विनताको पतिदेवने, अत्यन्त अभीष्ट दो पुत्रोंके होनेका वरदान दे दिया। उस समय विनताने कश्यपजीसे ‘एवमस्तु ‘कहकर उनके दिये हुए वरको शिरोधार्य किया ।। १० ।।
यथावत् प्रार्थितं लब्ध्वा वरं तुष्टाभवत् तदा ।
कृतकृत्या तु विनता लब्ध्वा वीर्याधिकौ सुतौ ।। ११ ।
अपनी प्रार्थनाके अनुसार ठीक वर पाकर वह बहुत प्रसन्न हुई । कद्रूके पुत्रोंसे अधिक बलवान् और पराक्रमी – दो पुत्रोंके होनेका वर प्राप्त करके विनता अपनेको कृतकृत्य मानने लगी ।। ११ ।।
कद्रूश्च लब्ध्वा पुत्राणां सहस्रं तुल्यवर्चसाम् ।
धार्थी प्रयत्नतो गर्भावित्युक्त्वा स महातपाः ।। १२ ।।
ते भायें वरसंतुष्टे कश्यपो वनमाविशत् ।
समान तेजस्वी एक हजार पुत्र होनेका वर पाकर कद्रू भी अपना मनोरथ सिद्ध हुआ समझने लगी। वरदान पाकर संतुष्ट हुई अपनी उन धर्मपत्नियोंसे यह कहकर कि ‘तुम दोनों यत्नपूर्वक अपने-अपने गर्भकी रक्षा करना’ महातपस्वी कश्यपजी वनमें चले गये ।। १२ ।।
सौतिरुवाच
कालेन महता कद्रूरण्डानां दशतीर्दश ॥ १३ ॥
जनयामास विप्रेन्द्र द्वे चाण्डे विनता तदा ।