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इंटरनेट पर श्रीरामजी का सबसे बड़ा विश्वकोश | RamCharitManas Ramayana in Hindi English | रामचरितमानस रामायण हिंदी अनुवाद अर्थ सहित

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बालकाण्ड मैथिली भाषा अर्थ सहित

Spread the Glory of Sri SitaRam!

 श्री गणेशाय नमः 
 श्रीजानकीवल्लभो विजयते 
 श्री रामचरित मानस 

प्रथम सोपान

(बालकाण्ड)

श्लोक
वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।
मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ।।1।।

 

 

जिनक मनमे श्रीरामचन्द्रजीक चरणमे सुन्नर प्रेम अछि, ओ एहि सरोवरकेँ कहियो नहि छोरैछ । हे भाई ! जे कियो एहि सरोवरमे स्नान करय चाही ओ मन लगाकय सत्संग करौथ ।।4।।

एहन मानस सरोवरकेँ हृदयक आँखिसँ देखिकय आओर ओहिमे डुब्बी मारिकय कविक बुद्धि निर्मल भय गेल, हृदयमे आनंद आओर उत्साह भरि गेल आओर प्रेम आ आनंदक प्रवाह उमरि आयल ।।5।।

ताहिसँ ओ सुन्नर कवितारूपि नदी बहि गेल, जाहिमे श्रीरामजीक निर्मल यशरूपि जल भरल अछि । एहि (कवितारूपिणि नदी) क नाम सरयू अछि, जे संपूर्ण सुन्नर मंगलसभक जडि अछि । लोकमत आओर वेदमत एहिक दूटा सुन्नर किनार अछि ।।6।।

ई सुन्नर मानस-सरोवरक कन्या सरयू नदी बड पवित्र आओर कलियुगक [छोट-पैघ] पापरूपि तिनका आओर वृक्षसभकेँ जडिसँ उखारिकय फेकन्हिहार अछि ।।7।।
तीनू प्रकारक श्रोतासभक समाजे एहि नदीक दुनू किनारपर बसल पुर, गाँव आओर नगर छथि; आओर संतसभक सभाएटा सभ सुन्नर मंगलसभक जडि अनुपम अयोध्याजी छथि ।।39।।
सुन्नर कीर्तिरूपि सोहनगर सरयूजी रामभक्तिरूपि गंगाजीमे जा मिललन्हि । अनुज लक्ष्मणसहित श्रीरामजीक युद्घक पवित्र यशरूपि सोहनगर महानद सोन ओहिमे आबि मिलल ।।1।।
दुनूक बीचिमे भक्तिरूपि गंगाजीक धारा ज्ञान आओर वैराग्यक संग सोभित भय रहल अछि । एहन तीनू तापसभकेँ डेराबयवाली ई तिमुहानि नदि रामस्वरूपि समुद्र दिसि जा रहल अछि ।।2।।

एहि (कीर्तिरूपि सरयू)क मूल मानस (श्रीरामचरित) अछि आओर ई [रामभक्तिरूपि] गंगाजीमे मिलल अछि, एहिलेल ई सुनयवाला सज्जनसभकेँ मनकेँ पवित्र कय देत । एहिकेँ बीच-बीचमे जे भिन्न-भिन्न प्रकारक विचित्र कथासभ अछि वएह बुझू नदितटक आस-पासक वन आओर बाग अछि ।।3।।

श्री पार्वतीजी आओर शिवजीक विवाहक बरियाति एहि नदिमे बहुत तरहकेँ असंख्य जलचर जीव छथि । श्रीरघुनाथजीक जन्मक आनन्द-बधाईये एहि नदिकेँ भँवर आओर तरंगसभक मनोहरता अछि ।।4।।
चारू भाईकेँ जे बालचरित छन्हि, वएह एहिमे फुलायल रंग-बिरंगक बहुत रास कमल छथि । महाराज दसरथजी आ हुनक रानीसभ आओऱ कुटुम्बक सत्कर्म (पुण्य) टा भ्रमर आओऱ जलपक्षी छथि ।।40।।
श्रीसीताजीक स्वयंवरक जे सुन्नर कथा अछि, वएह एहि नदमे सोहनगर छबि छाबि रहल अछि । अनेको सुन्नर विचारपूर्ण प्रश्ने एहि नदिक नावसभ अछि आओऱ हुनक विवेकयुक्त उत्तरे चतुर केवट छथि ।।1।।
एहि कथाकेँ सूनिकय पाछू जे अपनामे चर्चा होईत अछि, वएह एहि नदिक सहारे-सहारे चलन्हिहार यात्रीसभक समाज शोभा पाबि रहल अछि । परशुरामजीक श्रेष्ठ वचनेटा सुन्नर बान्हल गेल घाट छथि ।।2।।
भायसभक सग श्रीरामचन्द्रजीक विवाहक उत्साहे एहि कथा-नदीक कल्याणकारिणि बाढि अछि, जे सभकेँ सुख देनहार अछि । एहिकेँ कहय-सुनयमे जे हर्षित आओर पुलकित होईत छथि , वएह टा पुण्यात्मा पुरुष छथि, जे प्रसन्न मनसँ एहि नदिमे नहाईत छथि ।।3।।
श्रीरामचन्द्रजीक राजतिलकक लेल जे मंगल-साज सजायल गेल, वएह बुझू पावनिकाल एहि नदिपर यात्रीसभक झुंड जमा भेल छथि । कैकेयीक कुबुद्धिये एहि नदिमे काई अछि, जाहिक फलस्वरुप बड भारी बिपैत आबि पडल ।।4।।
सम्पूर्ण अनगिनत उत्पातसभकेँ शान्त करयवाला भरतजीक चरित्र नदि-तटपर कयल जायवाला जपयज्ञ अछि । कलियुगकेँ पापसभ आओर दुष्टसभकेँ अवगुणसभकेँ जे वर्णन अछि वएह एहि नदिक जलक कादो आ बगुला-कौआसभ अछि ।।4।।
ई कीर्तिरूपिणि नदि छहो ऋृतुमे सुन्नर अछि । सभ काल ई परम सोहनगर आओर अत्यंत पवित्र अछि । एहिमे शिव-पार्वतीक विवाह हेमंत ऋृतु अछि । श्रीरामचन्द्रजीक जन्मक उत्सव शुखदायि शिशिर ऋृतु अछि ।।1।।
श्रीरामचन्द्रजीक विवाह-समाजक वर्णने आनन्द-मंगलमय ऋृतुराज वसंत अछि । श्रीरामजीक वनगमन दु:सह ग्रीष्म ऋृतु अछि आओर मार्गक कथा टा कडगर रौद आ लू अछि ।।2।।
राच्छससभकेँ संग घोर युद्धे वर्षा ऋृतु अछि, जे देवकुलरूपि धानक लेल सुन्नर कल्याण करन्हिहार अछि । रामचन्द्रजीक राज्यकालक जे सुख, विनम्रता आओर बडाई अछि वएह निर्मल सुख देनहार सोहनगर सरद ऋृतु अछि ।।3।।
सती-शिरोमणि श्रीसीताजीकेँ गुणसभक जे कथा अछि, वएह एहि जलक निर्मल आ अनुपम गुण अछि । श्रीभरतजीक स्वभाव एहि नदिक सुन्नर शीतलता अछि, जे सदिखन एके रहैत अछि आ जकर वर्णन नहि कयल जा सकैछ ।।4।।
चारू भयकेँ परस्पर देखब, बाजब, मिलब, एक दोसरसँ प्रेम करब, हँसब आओर सुन्नर भायपन एहि जलक मधुरता आ सुगंध अछि ।।42।।
हमर आर्तभाव, विनय आओर दीनता एहि सुन्नर आओर निर्मल जलक कम हलकापन नहि अछि (अर्थात अत्यंत हल्कापन अछि) । ई पानि बड अदभुत अछि, जे सुनलेटासँ गुण करैत अछि आओर आशारूपि पियासकेँ आओर मनक मैल केँ फराक कय दैत अछि ।।1।।
ई जल श्रीरामचन्द्रजीक सुन्नर प्रेमकेँ पोषैत अछि, कलियुगकेँ समस्त पापसभ आओर ओहिसँ होबयवला ग्लानिकेँ हैर लैत अछि । संसारकेँ (जन्म-मृत्युरूप) श्रमकेँ सोखि लैत अछि, सन्तोषकेँ सेहो सन्तुष्ट करैत अछि आओर पाप, ताप, दरिद्रता आओर दोषसभकेँ नष्ट कय दैत अछि ।।2।।
ई जल काम, क्रोध, मद आओर मोहक नाश करन्हिहार आओर निर्मल ज्ञान आओर वैराग्यकेँ बढौन्हिहार अछि । एहिमे आदरपूर्वक स्नान कयलासँ आओर एहिकेँ पीलासँ हृदयमे रहयबाला सभटा पाप-ताप मेट जाइत अछि ।।3।।
जे कियो एहि (राम-सुयशरूपि) जलसँ हृदयकेँ नहि धयलन्हि ओ कायर कालिकाक द्वारा ठठगल गेलाह । जेनाँ पियासल हरिन सुर्यक किरिणकेँ बालुपर परलासँ उत्पन्न भेल जलक भ्रमकेँ वास्तविक जल बूझिकय पीबाकलेल दौगैत अछि आ जल नहि पाबिकय दुखी होइत अछि, तहिना ओ (कलियुगसँ ठगल गेल) जीव सेहो [विषयसभक पाछू भटकिकय] दुखी होयताह ।।4।।
अपन बुद्धिक अनुसारे एहि सुन्नर जलक गुणसभकेँ विचारिकय ओहिमे अपन मनकेँ स्नान कराकय आओर श्रीभवानी-शंकरकेँ स्मरण कय कवि (तुलसीदास) सुन्नर कथा कहैत अछि ।।43 (क)।।
हम आब श्रीरघुनाथजीक चरणकमलकेँ हृदयमे धारणकय आओर हुनक प्रसाद पाबिकय दुनू श्रेष्ठ मुनिगणकेँ मिलनक सुन्नर संवाद वर्णन करैत छी ।।43 (ख)।।
भरद्वाज मुनि प्रयागमे बसैत छथि, हुनक श्रीरामजीक चरणमे अत्यंत प्रेम अछि । ओ तपस्वी, निगृहीतचित्त, जितेन्द्रिय,दयाक निधान आओर परमार्थक मार्गमे बड रास चतुर छथि ।।1।।
माघमे जहन सूर्य मकर राशिपर जाईत छथि तहन सभकियो तीर्थराज प्रयागपर आबैत छथि । देवता, दैत्य, किन्नर आओर मनुष्यसभक समूह आदरपूर्वक त्रिवेनीमे स्नान करैत छथि ।।2।।
श्रीवेनीमाधवजीक चरणकमलकेँ पूजैत छथि आओर अक्षयवटक स्पर्शकय हुनक शरीर पुलकित होइत छन्हि । भारद्वाजजीक आश्रम बड राशि पवित्र, परम रमणीय आओर श्रेष्ठ मुनिसभक मनकेँ भावन्हिहार अछि ।।3।।
तीर्थराज प्रयागमे जे स्नान करबाकलेल जाइत छथि ताहि ऋृषि-मुनिसभक समाज ओतय (भारद्वाजक आश्रममे) जुटैत छथि । प्रात:काल सभ उत्साहपूर्वक स्नान करैत छथि आ ज्ञान-वैराग्यसँ युक्त भगवान् क भक्तिक कन्थन करैत छथि ।।44।।
एहि तरहेँ माघकेँ मासभरि स्नान करैत छथि आओर फेर सभ अपन-अपन आश्रममे चल जाइत छथि । हर साल ओतय एहने पैघ आनन्द होईत अछि । मकरमे स्नान कयकँ मुनिगण चल जाइत छथि ।।1।।
एक बेर भरि मकर स्नानकय सभ मुनीश्वर अपन-अपन आश्रममे लौट गेलाह । परम ज्ञानी याज्ञवल्क्य मुनिकेँ चरण पकडिकय भरद्वाजजी राखि लेलाह ।।2।।
आदरपूर्वक हुनक चरण धोयलन्हि आओर खूब पवित्र हुनका बैसौलन्हि । पूजा कयकँ मुनि याज्ञवल्क्यजीक सुयशक वर्णन कयलन्हि आओर फेर अत्यंत पवित्र आ कोमल वाणीसँ कहलन्हि – ।।3।।
हे नाथ ! हमरा मनमे एकटा पैघ संदेह अछि; वेदसभक तत्व सभ अपनेक मुट्ठीमे अछि (अर्थात अपनेटा वेदक तत्व बुझन्हिहार होयबाक कारणे हमर संदेहक निवारण कय सकैत छी) मुदा ओहि सन्देहकेँ कहैत हमरा भय आओर लाज आबैत अछि [भय एहिलेल कि कतहु अपने ई नहि बूझि जे हमर परीक्षा लय रहल अछि, लाज एहिलेल जे एतेक आयु बीति गेल, एखन धरि ज्ञान नहि भेल] आ जौं नहि कही तँ पैघ हानि होईत अछि [किएकतँ बनल रहैत छी] ।।4।।
हे प्रभो! संतगण एहन नीति कहैत छथि आओर वेद, पुराण आ मुनिगण सेहो इएह कहैत छथि जे गुरुक संग नुकयलासँ हृदयमे निर्मल ज्ञान नहि होईछ ।।45।।
ईएह सोचिकय हम अपन अज्ञान प्रकट करैत छी । हे नाथ! सेवकपर कृपा कयकँ एहि अज्ञानकेँ नाश कयल जाय । संतसभ, पुराणसभ आओर उपनिषदसभ रामनानक असीम प्रभावक गान कयने छथि ।।1।।
कल्याणस्वरूप, ज्ञान आओर गुणसभक राशि, अविनाशि भगवान् शम्भु निरन्तर रामनामक जाप करैत छथि । संसारमे चारि जातिक जीव छथि, काशीमे मरलासँ सभटा परमपदकेँ प्राप्त करैत छथि ।।2।।
हे मुनिराज! ओ सेहो राम [नाम] टाक महिमा अछि, किएकतँ शिवजी महाराज दया कयकँ [काशीमे मरयवाला जीवकेँ] रामनामटाक उपदेश करैत छथि [एहिसँ हुनका परमपद भेटैत अछि] । हे प्रभो! हम अपनेसँ पूछैत छी कि ओ राम के छथि ? हे कृपानिधान! हमरा बुझाकय कहल जाओ ।।3।।

एकटा राम तँ अवधेशनरेश दशरथजीक कुमार छथि, हुनक चरित्र संसारमे विदित अछि । ओ स्त्रीक विरहमे अपार दु:ख उठौलन्हि आओर क्रोध अयलापर युद्धमे रावणकेँ मारि देलन्हि ।।4।।

हे प्रभो! वएह राम छथि वा आओर कियो दोसर छथि, जिनका शिवजी जपैत छथि ? अपने सत्यक धाम छी आओर सभ किछु जानैत छी, ज्ञान विचारिकय कहय जाय ।।46।।

हे नाथ! जाहि प्रकारेँ हमर ई भारी भ्रम मेटय, अपने सएह कहल जाय । एहिपर याज्ञवल्क्यजी मुसुका कय कहलन्हि, श्रीरघुनाथजीक प्रभुताकेँ तू नहि जानैत छह ।।1।।

जौं अपनेक हृदयमे बेसिये हठ अछि आओर विवाहक बातचीत (बरेखी) केने बिनु रहल नहि जाइत अछि , तँ संसारमे वर-कन्या बहुत छथि । खेलवाड करन्हिहारकेँ आलस्य तँ होइत नहि अछि [दोसर ठाम कतहु जाकय करू] ।। 2 ।।

हमर तँ करोडो जन्मधरि इएह हठ रहत जे वा तँ हम शिवजीकेँ वरब, नहि तँ कुमइरेँ रहब । स्वयं शिवजी सै बेर कहथि, तईयो नारदजीक उपदेशकेँ नहि छोडब ।। 3 ।।
जगज्जननी पार्वतीजी फेर कहलन्हि जे हम आहाँक पैर पडैत छी । अपने अपन घर जईयौ, बहुत देर भय गेल । [शिवजीमे पार्वतीजीक एहन] प्रेम देखिकय ज्ञानी मुनि कहलाह – हे जगज्जननी ! हे भवानि ! अपनेक जय हो ! जय हो ! ! ।। 4 ।।
अपने माया थिकहुँ आओर शिवजी भगवान छथि । अपने दुनू गोटेँ समस्त जगत् क माता पिता छी । [ई कहिकय] मुनि पार्वतीजीक चरणमे सिर नवाकय चलि देलन्हि । हुनक शरीर बेर-बेर पुलकित भय रहल छल ।। 81 ।।
मुनिसभ जाकय हिमवानकेँ पार्वतीजी लग भेजलाह आओर ओ विनती कय हुनका घर लय अयलाह ; फेर सप्तर्षिगण शिवजी लग जाकय हुनका पार्वतीजीक सभटा कथा सुनयलाह ।। 1 ।।
पार्वतीजीक प्रेम सुनितहि शिवजी आनन्दमग्न भय गेलाह । सप्तर्षि प्रसन्न भय अपन घर (ब्रम्हलोक) चलि गेलाह । तखन सुजान शिवजी मनकेँ स्थिर कय क श्रीरघुनाथजीक ध्यान करय लगलाह ।। 2 ।।

तू मन, वचन आओर कर्मसँ श्रीरामजीक भक्त छह । तोहर चतुराई हम जानि गेलियह । तू श्रीरामजीकेँ रहस्यमय गुणणसभकेँ सुनय चाहैत छह; तेँ तू एहन प्रश्न कयलह जेनाँ पैघ मूढ होयबह ।।2।।
हे तात! तू सादर मन लगाकय सुनह; हम श्रीरामजीक सोहनगर कथा कहैत छियह । बड भारी अज्ञान महिषासुर अछि आओर श्रीरामजीक कथा [ओकरा नष्ट करन्हिहार कालीजी छथि] ।।3।।
श्रीरामजीक कथा चानक किरिन जेकाँ अछि, जकरा संतरूपि चकोर सदिखन पान करैत छथि । एहने संदेह पार्वतीजी कयने रहथि, तखन महादेवजी विस्तारसँ ओकर उत्तर देने छछलाह ।।4।।
आब हम अपन बुद्धिक अनुसारेँ वएह उमा आओर शिवजीक संवाद कहैत छी । ओ जाहि समय आओर जाहि हेतुसँ भेल, तकरा हे मुनि आहाँ सुनू, आहाँक विषाद मेट जायत ।।47।।
एकबेर त्रेतायुगमे शिवजी अगस्त्य ऋृषि ओतय गेलाह । हुनका संग जगज्जननी भवानी सतीजी सेहो रहथि । ऋृषि सम्पुर्ण जगतक ईश्वर जानिकय हुनक पूजा कयलन्हि ।।1।।
मुनिश्वर अगस्त्यजी रामकथा सविस्तार कहलन्हि, जकरा महेश्वर परम सुख मानिकय सुनलाह । फेर ऋृषि शिवजीसँ सुन्नर हरिभक्ति पुछलन्हि आओर शिवजी अधिकारि पाबिकय [रहस्यसहित] भक्तिक निरुपन कयलाह ।।2।।
श्रीरघुनाथजीक गुणसभक कथासभ कहैत-सुनैत किछु दिन धरि शिवजी ओतय रहलाह । फेर मुनिसँ विदा माँगिकय शिवजी दक्षकुमारि सतीजीक संगे घर (कैलास) चललाह ।।3।।
ताहि समय पृथ्वीक भार उतारबाक लेल श्रीहरि रघुवंशमे अवतार लेने छलाह । ओ अविनाशि भगवान् ओहि समय पिताक वचनसँ राज्यक त्याग कय तपस्वी वा साधुवेशमे दण्डकवनमे विचरि रहल छलाह ।।4।।
शिवजी हृदयमे विचारैत जा रहल छलाह जे भगवानक दर्शन हमरा कोन तरहेँ होयत । प्रभु गुप्त रूपसँ अवतार लेने छथि, हमरा गेलासँ सभ कियो बूझि जायत ।।48 (क)।।
श्रीशंकरजीक हृदयमे एहि बातकलेल बड छोभ उत्पन्न भय गेलन्हि, मुदा सतीजी एहि भेदकेँ नहि जानैत छलीह । तुलसीदासजी कहैत छथि जे शिवजी मनमे [भेद खोलबाक] डर छलन्हि, मुदा दर्शनक लोभसँ हुनक आँखि ललचा रहल छलन्हि ।।48(ख)।।
रावण [ब्रम्हाजीसँ] अपन मृत्यु मनुष्यक हाथसँ मँगने छल । ब्रम्हाजीक वचनकेँ प्रभु सत्य करय चाहैत छलाह । हम जौँ लग नहि जाइत छी तँ बड पछतावा रहि जायत । एहि प्रकारेँ शिवजी विचार करैत छलाह, मुदा कोनोटा युक्ति ठीक नहि बसैत छल ।।1।।
एहि प्रकारेँ महादेवजी चिन्ताक वश भय गेलाह । तहने नीच रावण जाकय मारीचकेँ संग लेलक आओर ओ (मारीच) तुरंत कपट मृग बनि गेल ।।2।।
मूर्ख (रावण) छलि कय सीताजीकेँ हरि लेलक । ओकरा श्रीरामचन्द्रजीकेँ वास्तविक प्रभावक किछु पता नहि छल । मृगकेँ मारिकय भाई लक्ष्मण सहित श्रीहरि आश्रममे अयलाह आओर ओहिकेँ खाली देखिकय (अर्थात ओतय सीताजीकेँ नहि पाबिकय) हुनक नेत्रमे नोर भरि आयल ।।3।।
श्रीरघुनाथजी मनुष्यक भाँति विरहसँ व्याकुल छथि आओर भाई वनमे सीताजीकेँ खोजैत फिरि रहल छथि । जनिक कहियो कोनो संयोग-वियोग नहि अछि ताहिमे प्रत्यक्ष विरहक दु:ख देखल गेल ।।4।।
श्रीरघुनाथजीक चरित्र अति विचित्र अछि, ओहिकेँ पहुँचल ज्ञानिएटा जानैत छथि । जे मन्दबुद्धि छथि, ओ तँ विशेषरूपसँ मोहक वश भय हृदयमे किछु दोसरेँ बात बूझि लईत छथि ।।49।।
श्रीशिवजी ओहि अवसरपर श्रीरामजीकेँ देखलन्हि आओर हुनक हृदयमे बड भारी आनन्द उत्पन्न भेल । ओहि शोभाक समुद्र (श्रीरामचन्द्रजी)केँ शिवजी नेत्र भरिकय देखलन्हि, परन्तु अवसर ठीक नहि जानिकय परिचय नहि कयलन्हि ।।1।।
जगतकेँ पवित्र करन्हिहार सच्चिदानन्दक जय हो, एहि तरहेँ कहि कामदेवक नाश करयवाला श्रीशिवजी चलि पडलाह । कृपानिधान शिवजी बेर-बेर आनन्दसँ पुलकीत होईत सतीजीक संग चलि जा रहल छलाह ।।2।।
सतीजी शंकरजीक ओ दशा देखलन्हि तँ हुनक मनमे बड संदेह उत्पन्न भय गेल । [मने-मन कहय लागलीह जे] शंकरजीक समस्त जगत वन्दना करैत अछि, ओ जगतकेँ ईश्वर छथि; देवता, मनुष्य, मुनि सभ हुनका प्रति सीस नवावैत छथि ।।3।।
ओ एकटा राजपुत्रकेँ सच्चिदानन्द परमधाम कहिकय प्रणाम कयलन्हि आओर ओकर शोभा देखिकय ओ एतेक प्रेममग्न भय गेलाह कि एखनधरि हुनक हृदयमे प्रीति रोकलोसँ नहि रुकैछ ।।4।।
जे ब्रम्ह सर्वव्यापक, मायारहित, अजन्मित, अगोचर, इच्छारहित आओर भेदरहित अछि, आओर जाहिकेँ वेदो नहि जानैत अछि, की ओ देह धारण कय मनुष्य भय सकैत अछि ? ।।50।।
देवतासभकेँ हितक लेल मनुष्यशरीर धारण कयन्हिहार जे विष्णुभगवान छथि ओ सेहो शिवजीक भाँति सर्वज्ञ छथि । ओ ज्ञानक भण्डार, लक्ष्मीपति आओर असुरसभकेँ शत्रु भगवान् विष्णु की अज्ञानी जेकाँ स्त्रीकेँ खोजताह ? ।।1।।
फेर शिवजीक वचन सेहो मिथ्या नहि भय सकैछ । सभ कियो जानैत छथि कि शिवजी सर्वज्ञ छथि । सतीकेँ मनमे एहि प्रकारक अपार संदेह उठिकय ठाढ भेल, कोनो तरहेँ हुनक हृदयमे ज्ञानक प्रादुर्भाव नहि होईत छलन्हि ।। 2 ।।
यद्यपि भवानीजी तँ प्रकट किछु नहि कहलन्हि , मुदा अन्तर्यामी शिवजी सभटा जानि गेलाह । ओ कहलन्हि – हे सती ! सुनू, आहाँक स्त्रीस्वभाव अछि । एहन संदेह मनमे कखनो नहि राखक चाही ।। 3 ।।
जनिक कथा अगस्त्य ऋृषि गान कयलन्हि आओर जनिक भक्ति हम मुनिकेँ सुनलहुँ, ई वएह हमर इष्टदेव श्रीरघुनाथजी छथि, जनिक सेवा ज्ञानी मुनि सदिखन कयल करैत छथि ।। 4 ।।
ज्ञानी मुनि, योगी आओर सिद्ध निरंतर निर्मल चित्तसँ जिनक ध्यान करैत छथि आ वेद, पुराण आओर शास्त्र ‘नेति – नेति’ कहिकय जिनक कीर्ति गावैत छथि, तिनके सर्वव्यापक, समस्त ब्रम्हाण्डक स्वामि, मायापति, नित्य परम स्वतन्त्र ब्रम्हरूप भगवान श्रीरामजी अपना भक्तसभकेँ हितक वास्तेँ [अपना इच्छासँ] रघुकुलकेँ मणिरूपमे अवतार लेलाह । यद्यपि शिवजी बहुत बेर समझौलन्हि , तखनो सतीजीकेँ हृदयमे हुनक उपदेश नहि बैसल । तहन महादेवजी मनमे भगवानक मायाबल जानिकय मुसकुराईत बजलाह – ।। 51 ।।
जौं आहाँक मनमे बहुत संदेह अछि तँ आहाँ जाकय परीक्षा किएक नहि लईत छी ? जखन धरि आहाँ हमरा लग लौट आयब ता धरि हम एहि बडक छाँहमे बैसल छी ।। 1 ।।
जाहि तरहेँ आहाँक ई अज्ञानजनित भारी भ्रम फराक होवय, [भलभाँति] विवेकसँ सोचि-समझिकय आहाँ वएह करब । शिवजीक आज्ञा पाबिकय सती चललीह आओर मनमे सोचय लगलीह कि भाई ! की करू (कोना परीक्षा लू) ? ।। 2 ।।
इमहर शिवजी मनमे एहन अनुमान कयलाह कि दक्षकन्या सतीक कल्याण नहि अछि । जहन हमरा समझयलोसँ संदेह फराक नहि होइछ तखन [बुझना जाइत अछि] विधाते उल्टा छथि, आब सतीक कुशल नहि अछि ।। 3 ।।
जे किछु राम रचि ऱाखने छथि, सएह होयत । तर्क कय क के शाखा (विस्तार) बढावय । [मनमे] एनाँ कहिकय शिवजी भगवान श्रीहरिक नाम जपय लगलाह आओर सतीजी ओतय गेलीह जतय सुखक धाम प्रभु श्रीरामचन्द्रजी छलाह ।। 4 ।।
सती बेर-बेर मनमे विचारिकय सीताजीक रूप धारण कय क ओहि मार्ग दीसि आगू भय चललीह, जाहिसँ [सतीजीक विचारानुसार] मनुष्यक राजा रामचन्द्रजी आबि रहल छलाह ।।52।।
सतीजीक बनावटी वेषकेँ देखिकय लक्ष्मणजी चकित भय गेलाह आओर हुनक हृदयमे बड भ्रम भय गेलन्हि । ओ बहुत गम्भीर भय गेलाह, किछु कहि नहि सकलाह । धीरबुद्धि लक्ष्मण प्रभु रघुनाथजीकेँ प्रभावकेँ जानैत छलाह ।। 1 ।।
सभ किछु देखयबला आओर सभक हृदयकेँ जानयबला देवताक स्वामि श्रीरामचन्द्रजी सतीकेँ कपटकेँ जानि गेलाह; जिनक स्मरणेमात्रसँ अज्ञानक नाश भय जाइत अछि, वएह सर्वज्ञ भगवान श्रीरामचन्द्रजी छथि ।। 2 ।।
स्त्रीस्वभावक असर तँ देखू जे ओतय (ओहि सर्वज्ञ भगवानक सोझा) सेहो सतीजी नुकाबय चाहैत छथि । अपन मायाक बलकेँ हृदयमे बखानिकय, श्रीरामचन्द्रजी हँसिकय कोमल वाणीसँ बजलाह ।। 3 ।।
पहिने प्रभु हाथ जोडिकय सतीकेँ प्रणाम कयलन्हि आओर पितासहित अपन नाओं बतौलन्हि । फेर कहलन्हि कि वृषकेतु शिवजी कतय छथि ? आहाँ एतय वनमे अकेलहि कयेक फिरि रहल छी ? ।। 4 ।।
श्रीरामचन्द्रजीक कोमल आओर रहस्यभरल वचन सुनिकय सतीजीकेँ बड संकोच भेलन्हि । ओ डेराइत (चुपचाप) शिवजी लग चललीह, हुनक हृदयमे बज चिन्ती भय गेलन्हि ।। 53 ।।
कि हन शंकरजीक कहब नहि मानलहुँ आओर अपन अज्ञानकेँ श्रीरामचन्द्रजीपर आरोप कयलहुँ । आब जाकय हम शिवजीकेँ की उत्तर देब ? [से सोचैत-सोचैत] सतीजीकेँ हृदयमे अत्यंत भयानक जरन उत्पन्न भेल ।। 1 ।।
श्रीरामचन्द्रजी जानि गेलाह जे सतीजीकेँ दु:ख ङेलन्हि, तखन ओ अपन किछु प्रभाव फ्रकट कय हुनका देखौलन्हि । सतीजी मार्गमे जाइत ई कौतुक देखलन्हि जे श्रीरामचन्द्रजी, सीताजा आओर लक्ष्मणसहित आगू चलि जा रहल छथि । [एहि अवसरपर सीताजीकेँ एहिलेल देखौलन्हि जे सतीजी श्रीरामकेँ सच्चिदानंदमय रूपकेँ देखथु, वियोज आओर दु:खक कल्पना जे हुनका भेल छलन्हि ओ फराक भय जाय आ ओ प्रकृतिस्थ होवथि] ।। 2 ।।
[तहन ओ] पाछू दिसि ताकिकय देखलाह, तँ ओतहु भाँई लक्ष्मणजी आओर सीताजीक संग श्रीरामचन्द्रजी सुन्नर वेषमे देखबा आयल । ओ जिमहर देखैत छथि, तिम्हरेँ फ्रभु श्रीरामचन्द्रजी विराजमान छथिआओर सचतुर सिद्ध मुनीश्वर हुनक सेवा कय रहल छथि ।। 3।।
सतीजी तँ अनेक शिव, ब्रम्हा आओर विष्णु देखलन्हि जे एक-सँ एक बढिकय, असीम प्रभावबला छलाह । [ओ देखलन्हि जे] भाँति-भाँतिकेँ वेष धारण कयने सभ देवता श्रीरामचन्द्रजीक चरणवंदना आओर सेवा कय रहल छथि ।। 4 ।।
ओ अनगनित अनुपम सती, ब्रम्हाणी आओर लक्ष्मी देखलन्हि । जाहि-जाहि रूपमे ब्रम्हा आदि देवता छलाह, ताहि अनुकूलेँ रूपमे [हुनक] ई सभ [शक्ति सभ] सेहो रहथि ।। 54 ।।
सतीजी तँ जतय-जतय जतेक रघुनाथजी देखलन्हि, शक्तिसभकसंग ओतय ओतबा सभ देवतासभकेँ सेहो देखलन्हि । संसारमे जे चराचर जीव अछि, ओ सेहो अनेक प्रकारसँ सभ देखलन्हि ।। 1 ।।
[ओ देखलन्हि जे] अनेको वेष धारण कय देवता प्रभु श्रीरामचन्द्रजीक पूजा कय रहल छथिी । मुदा श्रीरामचन्द्रजीक दोसर रूप कतहु नहि देखलन्हि । सीतासहित श्रीरघुनाथजी बड रासि देखलन्हि, मुदा हुनक वेष अनेक नहि छलन्हि ।।2 ।। [सभ ठाम] वएह रघुनाथजी, वएह लक्ष्मणजी आओर वएह सीताजी – सती एनाँ देखिकय बहुत डेराय गेलीह । हुनक हृदय काँपय लागल आओर देहक सभटा सुधि-बुधि चलि गेल । ओ आँखि मुनिकय मार्गमे बैस गेलीह ।। 3 ।।
फेर आँखि ताकिकय देखलन्हि, तँ ओतय दक्षकुमारि (सतीजी) केँ किछुओ नहि देखबा आयल । तखन ओ बेर-बेर श्रीरामचन्द्रजीक चरणमे सिर नवाय ओतय चललीह जतय शिवजी छलाह ।। 4 ।।
जहन लगमे पहुँचलीह, तहन श्रीशिवजी हँसिकय कुशल – प्रश्न कय कहलन्हि जे आहाँ रामजीक कोन तरहेँ परीक्षा लेलहुँ, सभटा बात साँच-साँच कहू ।। 55 ।।

मासापरायण, दोसर विश्राम

सतीजी श्रीरघुनाथजीक प्रभावकेँ बुझिकय भयवश शिवजीसँ नुकयलन्हि आओर कहलन्हि – हे स्वामिन ! हम तँ किछुओ परीक्षा नहि लेलहुँ, [ओतय जा कय] अपनेहेक जेकाँ प्रणाम कयलहुँ ।। 1 ।।
जे आहाँ कहलहुँ से फुसि नहि भय सकैछ, हमर मनमे ई पैघ (पूर) विश्वास अछि । तहन शिवजी ध्यान कय क देखलन्हि आओर सतीजी जे चरित्र कयने रहथि, सभटा बूझि गेलाह ।। 2 ।।
फेर श्रीरामचन्द्रजीक मायाकेँ सिर नवौलन्हि, जे प्रेरणा कय सतीजीक मुखसँ फुसि कहबाय देलक । सुजान शिवजी मनमे विचार कयलन्हि जे हरिक इच्छरूपि भावि प्रबल अछि ।। 3 ।।
सतीजी सीताजीक वेष धारण कयलन्हि, ई जानिकय शिवजीक हृदयमे पैघ विषाद भेल । ओ सोचलन्हि जे जौं हम आब सतीसँ प्रीति करैत छी तँ भक्तिमार्ग लुप्त भय जाइत अछि आओर पैघ अन्याय होइत अछि ।। 4 ।।
सती परम पवित्र छथि, तेँ हिनका छोरइतो नहि बनैछ आओर प्रेम करबामे पैघ पाप अछि, प्रकट कय क महादेवजी किछु कहैत नहि छथि, मुदा हुनक हृदयमे पैघ संताप अछि ।। 56 ।।
तहन शिवजी प्रभु श्रीरामचन्द्रजीक चरणकमलमे माथ नवौलन्हि आओर श्रीरामजीक स्मरण करितहि हुनक मनमे ई अयलन्हि जे सतीक एहि शरीरसँ हमर [पति-पत्नीक रूपमे] भेंट नहि भय सकैछ आओर शिवजी अपन मनमे ई संकल्प कय लेलन्हि ।। 1 ।।
स्थिरबुद्धि शंकरजी एनाँ विचारिकय श्रीरघुनाथजीक स्मरण करैत अपन घर (कैलास) दिसि चललाह । चलैत काल सुन्नर आकाशवाणी भेल जे हे महेश ! अपनेक जय हो । अपने भक्तिक नीक दृढता कयलहुँ ।। 2 ।।
अपनेकेँ छोडिकय दोसर के एहन प्रतिज्ञा कय सकैत अछि ? अपने श्रीरामचन्द्रजीक भक्त थिकहुँ, समर्थ थिकहुँ आओर भगवान थिकहुँ । एहि आकाशवाणीकेँ सूनिकय सतीजीकेँ मनमे चिंता भेल आओर ओ सकुचाइत शिवजीसँ पूछलन्हि ।। 3 ।।
हे कृपालु ! कहू, अपने कोन प्रतिज्ञा कयने छी? हे प्रभो ! सत् क धाम छी । यद्यपि सतीजी बहुत प्रकारसँ पूछलन्हि, मुदा त्रिपुरारि शिवजी किछु नहि कहलन्हि ।। 4 ।।
सतीजी हृदयमे अनुमान कयलन्हि जे सर्वज्ञ शिवजी सभटा जानि गेलाह । हम शिवजीसँ कपट कयलहुँ, स्त्री स्वभावेँसँ मूर्ख आ बेसमझ होइत अछि ।। 57 (क) ।।
प्रीतक सुन्नर रीति देखू जे पानियो [दूधक संग मिलिकय] दूधक समान भाव बिकाईत अछि; मुदा कपटरूपि खटाई पइडतेँ पानी पृथक भय जाइत अछि (दूध फाटि जाइत अछि) आओर स्वाद (प्रेम) पडाईत अछि ।। 57 (ख) ।।
अपन करनीकेँ स्मरण कय क सतीजीक हृदयमे एतबा सोच छन्हि आओर एतबा अपार चिंता अछि जे जकर वर्णन नहिं कयल जा सकैछ । [ओ समझि लेलन्हि जे] शिवजी कृपाक परम अथाह सागर छथि, ताहिसँ प्रकटमे ओ हमर अपराध नहि कहलाह ।। 1 ।।
शिवजीक रूप देखकय सती जानि गेलीह जे हमरा तजि देलन्हि आओर ओ हृदयमे व्याकुल भय गेलीह । अपन पाप बूझिकय किछु कहैत नहि बनैछ, मुदा हृदय [भितरेँ-भितरेँ] कुम्हारक आँवा जेकाँ अत्यंत जरय लागल ।। 2 ।।
वृषकेतु शिवजी सतीकेँ चिन्तायुक्त जानिकय हनका सुख देबा लेल सुन्नर कथासभ कहलन्हि । एहि प्रकारेँ मार्गमे विविध प्रकारकेँ इतिहाससभकेँ कहैत विश्वनाथ कैलास जा पहुँचलाह ।। 3 ।।
ओतय शिवजी अपन प्रतिज्ञा स्मरण कय बड गाछक निच्चाँ पद्मासन लगाकय बैस गेलाह । शिवजी अपन स्वभाविक रूप समाहरलन्हि । हुनक अखंड आओर अपार समाधि लागि गेलन्हि ।। 4 ।।
तहन सतीजी कैलासपर रहय लगलीह । हुनक मनमे बड दु:ख छलन्हि । एहि रहस्यकेँ कियो किछुओ नहि जानैत छल । हुनक एक-एक दिन युग जेकाँ हीति रहल छल ।। 58 ।।
सतीजीक हृदयमे नित्य नव आओर भारी सोच भय रहल छल जे हम एहि दु:ख समुद्रकेँ पार कखन जायब । हम जे श्रीरघुनाथजीक अपमान कयलहुँ आओर फेर पतिकेँ वचनकेँ फूसि जनलहुँ – ।। 1 ।।
ओकर फल विधाता हमरा देलन्हि, जे उचित छल वएह कयलन्हि ; मुदा हे विधाता ! आब आहाँकेँ ई उचित नहि अछि जे शंकरसँ विमुख भेलोपर हमरा जिआ रहल छथि ।। 2।।
सतीजीक हृदयक ग्लानि किछु कहल नहि जाइछ । बुद्धिमति सतीजी मनमे श्रीरामचन्द्रजीक स्मरण कयलन्हि आओर कहलन्हि – हे प्रभो ! जौं अपने दीनदयालु कहाबैत छी आओर वेदसभ अपनेक ई यश गयने अछि जे अपने दु:खकेँ हरन्हिहार छी, ।। 3 ।।
तँ हम हाथ जोडिकय विनती करैत छी जे हमर ई देह जल्दी छूटि जाय । जौं हमरा शिवजीक चरणमे प्रेम अछि आओर हमर ई [प्रेमक] व्रत मन, वचन आओऱ कर्म (आचरण)सँ सत्य अछि।।4।।
तहन हे सर्वदर्शि प्रभो सुनलजाय आओर शीघ्र ओ उपाय कयल जाय जाहिसँ हमर मरण होवय आओर बिनु परिश्रमेँ ई [पति-परित्यागरूपि] असाध्य विपत्ति फराक भय जाय ।। 59 ।।
दक्षसुता सतीजी एहि तरहेँ बड दु:खी रहथि, हुनका एतेक दारुण दु:ख छलन्हि जे आब जगतक स्वामि (शिवजी) जगलाह । ओ जाकय शिवजीक चरणमे प्रणाम कयलन्हि । शिवजी हुनका बैसबाक लेल आगुमे आसन देलन्हि ।। 2 ।।
शिवजी भगवान हरिक रसगर कथासभ कहय लगलाह । ताहि काल दक्ष प्रजापति भेलाह । ब्रम्हाजी सभ तरहेँ देखि-समझिकय दक्षकेँ प्रजापतिसभक नायक बना देलन्हि ।। 3 ।।
जहन दक्ष एतेक पैघ अधिकार पौलन्हि तहन हुनक हृदयमे अत्यंत अभिमान आबि गेल । जगतमे एहन कियो जन्म नहि लेलक जकरा प्रभुता पाबिकय मद नहि भेल ।। 4 ।।
दक्ष सभ मुनि सभकेँ बजौलन्हि आओर ओ पैघ यज्ञ करय लगलाह । जे देवता यज्ञक भाग पाबैत छथि , दक्ष हुनका सभकेँ आदरसहित निमंत्रित कयलन्हि ।। 60 ।।
[दक्षक निमंत्रण पाबिकय] किन्नर , नाग , गन्धर्व आओऱ सभ देवता अपन-अपन स्त्रिसहित चललाह । विष्णु, ब्रम्हा आओर महादेवजीकेँ छोडि सभ देवता अपन-अपन विमान सजाकय चललाह ।। 1 ।।
सतीजी देखलन्हि अनेको प्रकारक सुन्नर विमान आकाशमे चलि जा रहल अछि । देव-सुन्नरिसभ मधुर गान कय रहल छलीह, जाहिकेँ सूनिकय मुनिसभक ध्यान छूटि जाइत अछि ।। 2 ।।
सतीजी [विमानसभमे देवतागणकेँ जयबाक कारण] पूछलन्हि, तहन शिवजी सभटा बात बतौलन्हि । पिताक यज्ञक बात सूनिकय सती किछु प्रसन्न भेलीह आओर सोचय लगलीह जे जौं महादेवजी हमरा आज्ञा दईथ, तँ एहि बहन्नेँ किछु दिन पिताक घर जाकय रहितहुँ ।। 3 ।।
किएकतँ हुनक हृदयमे पतिद्वारा त्यागल जयबाक बड भाडी दु:ख छलन्हि, मुदा अपन अपराध बूझिकय ओ किछु कहैत नहि छलीह । आखिर सतीजी भय, संकोच आओर प्रेमरसमे सानल मनोहर वाणीसँ बजलीह – ।। 4 ।।
हे प्रभो ! हमर पिताक घर बड पैघ उत्सव अछि । जौं अपनेक आज्ञा होय तँ हे कृपाधाम ! हम सादर ओ देखय जाइ ।। 61 ।।
शिवजी कहलन्हि – आहाँ बात तँ नीक कहलहुँ , ई हमर मनकेँ सेहो पसिन्न भेल । मुदा ओ न्यौत नहि पठौलन्हि , ई अनुच्त अछि । दक्ष अपन सभ बेटीसभकेँ बजौलन्हि अछि; मुदा हमरासँ वैरक कारणेँ ओ अहूँकेँ बिसरा देलन्हि ।। 1 ।।
एकबेर ब्रम्हाकेँ सभामे हमरासँ अप्रसन्न भय गेल रहथि, तेँ ओ आबहो हमर अपमान करैत छथि । हे भवानि ! जे आहाँ बिनु न्यौतल जायब तँ ने शील-स्नेहेँ रहत आ ने मान-मर्यादेँ रहत ।।2।।
यद्यपि एहिमे संदेह नहि कि मित्र, स्वामि, पिता आओर गुरुक घर बिनु बोलयलो जयबाक चाही तथापियो जतय कियो विरोध मानैत होअय, ओकरा घर गेलासँ कल्याण नहि होइछ ।। 3 ।।
शिवजी बहुत तरहेँ समझौलन्हि मुदा होनहारवश सतीक हृदयमे बोध नहि भभेल । फेर शिवजी कहलन्हि कि जौं बिनु बोलायल जायब, तँ हमरा बुझनामे ई नीक बात नहि होयत ।। 4।।
शिवजी बहुत तरहेँ कहिकय देख लेलन्हि, किन्तु जहन सती कोनो तरहेँ नहि रुकलीह, तहन त्रिपुरारि महादेवजी अपन मुख्य गणसभकेँ संग दय हुनका विदा कय देलन्हि ।। 62 ।।
भवानि जहन पिता (दक्ष)केँ घर पहुँचलीह, तखन दक्षक डरेँ कियो हुनक आवभगत नहि कयलक, केवल एक माता भलेँ आदरसहित मिललीह, बहिनसभ बहुत मुसकाइत मिललन्हि ।। 1 ।।
दक्ष तँ हुनक किछु कुशलोधरि नहि पुछलन्हि । सतीजीकेँ देखिकय उनटेँ हुनक सभ अंग जरि उठल । तखन सती जाकय यज्ञ देखलन्हि तँ ओतय कतहु शिवजीक भाग नहि देखलन्हि ।। 2 ।।
तहन शिवजी कहने छलाह से हुनका बुझना आयल । स्वामीक अपमान जानिकय हृदय दहैक उठल । पछिला (पतिपरित्यागक) दु:ख हुनक हृदयमे ओतेक नहि व्यापल छल, जतेक महान दु:ख एहि समय (पति-अपमानक कारणेँ) भेल ।।3।।
यद्यपि जगतमे अनेक प्रकारक दारुण दु:ख अछि; तथापि जाति-अपमान सभभसँ बढिकय कठिन अछि । ई बूझिकय सतीजीकेँ बड क्रोध भय गेलन्हि । माता हुनका बहुत तरहेँ समझौलन्हि-बुझौलन्हि ।। 4 ।।
मुदा हुनका शिवजीक अपमान सहल नहि गेल, एहिलेल हुनक हृदयमे किछुओ प्रबोध नहि भेल । तखन ओ पूरा सभाकेँ हठपूर्वक डाँटिकय क्रोधभरल वचन बजलीह – ।। 63 ।।
हे सभासद आओर सकल मुनीश्वर ! सुनू । जे लोकसभ एतय शिवजीक निंदा कयलहुँ वा सुनलहुँ अछि, हुनका सभकेँ ओहि फल तुरंतेँ भेटत आओर हमप पिता दक्षो भलभाँति पछतयताह ।। 1 ।।
जतय संत, शिवजी आओर विष्णुभगवानक निंदा सुनल जाय ओतय एहन मर्यादा अछि जे जौं अपन वश चलय तँ ओहि (निंदा करन्हिहार) क जीह काटि लय आओर नहि तँ कान मुनिकय ओतयसँ भागि जाय ।। 2 ।।
त्रिपुर दैत्यकेँ मारयबला भगवान महेश्वर सम्पूर्ण जगतकेँ आत्मा छथि, ओ जगत्पिता आओर सभक हित करन्हिहार छथि; आ हमर ई देह दक्षेकेँ वीर्यसँ उत्पन्न अछि ।। 3 ।।
तेँ हेतु चानकेँ ललाटपर धारण करयबला वृषकेतु शिवजीकेँ हृदयमे धारण कय हम एहि शरीरकेँ तुरंतेँ त्यागि देब । एनाँ कहि सतीजी योगाग्निमे अपन शरीर भस्म कय देलीह । संपूर्ण यज्ञशालामे हाहाकार मचि गेल ।। 4 ।।
सतीक मरण सुनिकय शिवजीक गण यज्ञ विध्वंस करय लगलाह । यज्ञ विध्वंस होइत देखिकय मुनीश्वर भृगुजी ओहिकेँ रक्षा कयलन्हि ।। 64 ।।
ई सभटा समाचार शिवजीकेँ भेटल, तखन ओ क्रोधकय वीरभद्रकेँ भेजलन्हि । ओ ओतय जाकय यज्ञ विध्वंस कय देलन्हि आओर सभ देवतासभकेँ यथोचित फल (डण्ड) देलन्हि ।। 1 ।।
दक्षक जगत्प्रसिद्ध वएह गति भेल जे शिवद्रोहिक होइत अछि । ई इतिहास संपूर्ण संसार जानैत अछि, तेँ हम संक्षेपमे वर्णन कयलहुँ ।। 2 ।।
सती मरैत काल भगवान हरिसँ ई वर मँगलीह जे हमर जन्म-जन्ममे शिवजीक चरणमे अनुराग रहय । एहि कारण ओ हिमाचलक घर जा पार्वतीक शरीर पौलन्हि ।। 3 ।।
जहनसँ उमाजी हिमाचलक घर जनमलीह तहनसँ ओतय सभटा सिद्धि आओर संपैत छाबि गेल । मुनिसभ जतय-ततय सुन्नर आश्रम बना लेलन्हि आओर हिमाचल हुनकासभकेँ उचित स्थान देलन्हि ।। 4 ।।
ओहि सुन्नर पर्वतपर बहुत प्रकारक सभ नव-नव वृक्ष सदा पुष्प-फलयुक्त भय गेल आओर ओतय बहुत तरहक मणिसभक खान प्रकट भय गेल ।। 65 ।।
सभ नदिसभमे पवित्र जल बहैत अछि आओर पक्षी, पशु, भ्रमर सभ सुखी रहैत अछि । सभ जीवसभ अपन स्वभाविक वैर छोडि देलक आओऱ पर्वतपर सभ परस्पर प्रेम करैत अछि ।। 1 ।।
पार्वतीजीकेँ घर आबि गेलासँ पर्वत एना शोभायमान भय रहल अछि जेना रामभक्तिकेँ पाबिकय भक्त शोभायमान होइत छथि । ओहि (पर्वतराज)केँ घरमे नित्य नव-नव मंगलोत्सव होइत अछि, जकर ब्रम्हादि यश गावैत छथि ।। 2 ।।
जहन नारदजी ई समाचार सुनलाह तँ ओ कौतुकेँसँ हिमाचलक घर पधारलाह । पर्वतराज हुनक बड आदर कयलन्हि आओर चरण पखारि हुनका उत्तम आसन देलन्हि ।। 3 ।।
फेर अपन स्त्रीसहित मुनिकेँ चरणमे माथ नमौलन्हि आओर हुनक चरणोदककेँ पूरा घरमे छिटबौलन्हि । हिमाचल अपन सौभाग्यक बहुत बखान कयलन्हि आओर पुत्रिकेँ बोलायकय मुनिक चरणपर राखि देलन्हि ।। 4 ।।
[आओर कहलन्हि] हे मुनिश्वर ! अपने त्रिकालज्ञ आओर सर्वज्ञ थिकहुँ, अपनेक सर्वत्र पहुँच अछि ! तेँ अपने हृदयमे विचारिकय कन्याक गुण-अवगुण कहू ।। 66 ।।
नारद मुनि हँसिकय रहस्ययुक्त कोमल वाणीसँ कहलन्हि – आहाँक कन्या सभभ गुणक खान अछि । ई स्वभावेँसँ सुन्नर, सुशील आओर समझदार अछि । उमा, अम्बिका आओर भवानी हिनक नाओं अछि ।। 1 ।।
कन्या सभटा सुलक्षणसँ सम्पन्न अछि , ई अपन पतिकेँ सदा प्रिय होयतीह । हिनक सुहाग सदा अचल रहत आओर हिनकासँ माता-पिता सदा यश पयताह ।। 2 ।।
ई सकल जगत् मे पूज्य होयतीह आओर हिनक सेवा कयलासँ किछुओटा दुर्लभ नहि रहत । संसारमे स्त्री हिनक नाम स्मरणकय क पतिव्रतरूपि तलवारक धारपर चढि जयतीह ।। 3 ।।
हे पर्वतराज ! आहाँक कन्या सुलक्षनि अछि । आब एहिमे जे दू-चारिटा अवगुण अछि, सेहो सुनि लियह । गुणहीन, मानहीन, माता-पिता विहीन, उदासीन, संशयहीन (लापरवाह) ।। 4 ।।
योगी, जटाधारि, निष्कामहृदय, नंग आओर अमंगल वेषबला, एहन पति हिनका मिलत । हिनका हाथमे एहने रेखा पडल अछि ।। 67 ।।
नारद मुनिक वाणी सुनिकय आओर ओहिकेँ हृदयमे सत्य जानिकय पति-पत्नी (हिमवान आओर मैना)केँ दु:ख भेलन्हि आओर पार्वतीजी प्रसन्न भेलीह । नारदजी सेहो एहि रहस्यकेँ नहि जानलाह, कियेकतँ सभक बाहरक दशा एकेँ जेकाँ भेलोसँ भितरक समझ भिन्न-भिन्न छलन्हि ।। 1 ।।
सभ सखी, पार्वती, पर्वतराज हिमवान् आओर मैना सभक शरीर पुलकित छलन्हि आओर सभक नेत्रमे जल भरल छल । देवर्षिक वचन असत्य नहि भय सकैछ, [ई विचारिकय] पार्वती ओहि वचनकेँ हृदयमे धारण कय लेलन्हि ।। 2 ।।
हुनका शिवजीक चरणकमलमे स्नेह उत्पन्न भय गेलन्हि, मुदा मनमे ई संदेह भेल जे हुनका मिलब कठिन अछि । अवसर ठीक नहि जानिकय उमा अपन प्रेमकेँ नुका लेलन्हि आओर फेर ओ सखीक गोदमे जाकय बैस गेलीह ।। 3 ।।
देवर्षिक वाणी फूसि नहि होयत, आ विचारिकय हिमवान् मैना आओर सभ चतुर सखि चिन्ता करय लागलीह । ऱेर हृदयमे धीरज धरिकय पर्वतराज कहलन्हि – हे नाथ ! कहू, आब कोन उपाय कयल जाय ? ।। 4 ।।
मुनिश्वर कहलन्हि – हे हिमवान ! सुनू, विधाता ललाटपर जे किछु लिख देने छथि, ओहिकेँ देवता, मनुष्य, नाग आओर मुनि कियोटा नहि मेट सकैछ ।। 68 ।।
तथापियो एकटा उपाय हम कहैत छी । जौं दैव सहायता करैथ तँ ओ सिद्ध भय सकैत अछि । उमाकेँ वर तँ नि:संदेह ओहने मिलतन्हि जेना हम आहाँकेँ वर्णन कयलहुँ अछि ।। 1 ।।
मुदा हम वरक जे-जे दोष बतयलहुँ अछि, हमरा अनुमानेँ से सभटा शिवजीमे छन्हि । जौं शिवजीक संगेँ विवाह भय जाय तँ दोशसभकेँ सेहो सभ कियो गुणेक समान कहताह ।। 2 ।।
जेनाँ विष्णुभगवान् शेषनागक शय्यापर सुतैत छथि, तियो पण्डितसभ हुनका कोनो दोष नहि लगावैत छथि । सूर्य आओर अग्निदेव नीक-अधलाह सभ रस सभक भक्षण करैत छथि, मुदा हुनका कियो अधलाह नहि कहैछ ।। 3 ।।
गंगाजीमे शुभ आओऱ अशुभ सबटा जल बहैत अछि, मुदा कियो ओहिकेँ अपवित्र नहि कहैछ । सूर्य, अग्नि आओर गंगाजीक भाँति समर्थकेँ किछु दोष नहि लागैछ ।। 4 ।।
जौं मूर्ख मनुष्य ज्ञानक अभिमानसँ एहि प्रकार होड करैत छथि तँ ओ कल्पभरिक लेल नरकमे पडैत छथि । भला कतहु जीवो ईश्वर जेकाँ (सर्वथा स्वतंत्र) भय सकैत अछि ।। 69 ।।
गंगाजलसँ बनायल गेल मदिराकेँ जानिकय संत गण कहियो ओकर पान नहि करैत छथि । करंच वएह गंगाजीमे निल गेलासँ जेना पवित्र भय जाइत अछि, ईश्वर आ जीवमे सेहो ओहने भेद अछि ।। 1 ।।
शिवजी सहजेँ समर्थ छथि, कियेकतँ ओ भगवान छथि । तेँ हेतु एहि विवाहमे सभ प्रकार कल्याण अछि । मुदा महादेवजीक आआराधना बड कठिन अछि, तईयो क्लेश (तप) कयलासँ ओ बहुत जल्दी संतुष्ट भय जाइत छथि ।। 2 ।।
जौं आहाँक कन्या तप करैथ, तँ त्रिपुरारि भविकेँ मेट सकैत छति । यद्य़पि संसारमे वर अनेक छथि, मुदा हिनका लेल शिवजीकेँ छोडि दोसर वर नहि अछि ।। 3 ।।
शिवजी वरदायक, शरणागतक दु:खसभक नाश करयबला , कृपाक समुद्र आओर सेवकसभक मनकेँ प्रसन्न करन्हिहार छथि । शिवजीक आराधना कयने बिनु करोडोटा योग आओर जप कयलोपर वाञछित फल नहि मिलैछ ।। 4 ।।
एना कहकय भगवान् क स्मरण करैत नारदजी पार्वतीकेँ आशिर्वाद देलन्हि । [आओर कहलन्हि जे -] हे पर्वतराज ! आहाँ संदेहक त्याग कय दू, आब ई कल्याणें होयत ।। 70 ।।
एना कहिकय नारद मुनि ब्रम्हलोक चलि गेलाह । आब आगू जे चरित्र भेल से सुनू । पतिकेँ एकांतमे पाबिकय मैना कहलन्हि – हे नाथ ! हम मुनिक वचनक अर्थ नहिं बुझलहुँ ।। 1 ।।
जौं हमर कन्याक अनुकूल घर-वर आओऱ कुल उत्तम होय तँ विवाह करू । नहि तँ बेटी चाहे कुमारि रहय (हम अधलाह वरक संग ओकर विवाह नहि करय चाहैत छी) कियेक तँ हे स्वामिन ! पार्वती हमरा प्रानपिआरि अछि ।। 2 ।।
जौं पार्वतीक योग्य वर नहि भेटल तँ सभ कियो कहत जे पर्वत स्वभवेँसँ जड (मूर्ख) होइत अछि । हे स्वामि ! एहि बातकेँ बिचारिकय विवाह करू, जाहिमे फेर पाछू हृदयमे सन्ताप नहि होय ।। 3 ।।
एहि तरहेँ कहिकय मैना पतिक चरणपर मस्तक राखिकय खैसि पडलीह . तहन हिमवान प्रेमसँ कहलन्हि – चाहे चानमे अग्नि प्रकट भय जायनवमुदा नारदजीक वचन फूसि नहि भय सकैछ ।। 4 ।।
हे प्रिय ! सभटा सोच छोडिकय श्रीभगवान् क स्मरण करू । जे पार्वतीकेँ रचने छथि , वएह कल्याण करताह ।। 71 ।।
आब जौँ आहाँकेँ कन्यापर प्रेम अछि तँ जाकय हुनका ई शिक्षा दियS जे ओ एहन तप करथि जाहिसँ शिवजी भेट जान्हि । दोसर उपायसँ ई क्लेश नहि मेटत ।। 1 ।।
नारदजीक वचन रहस्ययुक्त आ सकारण छन्हि आओऱ शिवजी समस्त सुन्नर गुणसभक भण्डार छथि । ई विचारिकय आहाँ [मिथ्या] संदेहकेँ छोडि दियS । शिवजी सभ तरहेँ निष्कलंक छथि ।। 2 ।।
पतिक वचन सूनि मनमे प्रसन्न भय कय मैना उठिकय तुरंत पार्वती लग गेलीह । पार्वतीकेँ देखिकय हुनक आँखिमे नोर भरि आयल । हुनका स्नेहक संग गोदमे बैसा लेलन्हि ।। 3 ।।
फेर बेर-बेर हुनका हृदयसँ लगावय लागलीह । प्रेमसँ मैनाक गङा भडि आयल , किछु कहल नहि जाय । जगज्जननी भवानीजी तँ सर्वज्ञ छथि । [माताक मनक दशा जानिकय] ओ माताकेँ सुख देवयबला कोमल वाणीसँ बाजलीह – ।। 4 ।।
माय ! सुनू, हम आहाँकेँ सुनावैत छी; हम एहन स्वप्न देखलहुँ अछि जे हमरा एकटा सुन्नर गौरवर्ण श्रेष्ठ ब्राम्हण एहन उपदेश देने छथि ।। 72 ।।
हे पार्वती ! नारदजी जे कहने छथि, ओहिकेँ सत्य समझिकयआहाँ जाकय तप करू । फेर ई बात आहाँक माता-पिताकेँ सेहो नीक लागल अछि । तप सुख देवयबला, आओर दु:ख दोषक नाश करयबला अछि ।। 1 ।।
तपक बलसँ ब्रम्हा संसारकेँ रचैत छथि आओर तपेक बलसँ विष्णु समस्त जगतक पालन करैत छथि । तपेक बलसँ शम्भु [रुद्ररूपसँ जगत् क] संहार करैत छथि आओर तपेक बलसँ शेषजी पृथ्वीक भार धारण करैत छथि ।। 2 ।।
हे भवानि ! समस्त सृष्टि तपेक आधारपर अछि । एनाँ जीमे जानिकय आहाँ जाकय तप करू । ई बात सूनिकय माताकेँ बड अचरज भेलन्हि आओर ओ हिमवानकेँ बजाकय ई स्वप्न सुनौलन्हि ।। 3 ।।
माता-पिताकेँ बहुत तरहेँ समझाकय बड हर्षक संग पार्वतीजी तप करय लेल चललीह । प्रिय कुटुम्बि, पिता आओर माता सभ व्याकुल भय गेलीह । ककरो मुँहसँ बात नहि निकलैछ ।। 4 ।।
तखन वेदशिरा मुनि आबिकय सभकेँ समझाकय कहलन्हि । पार्वतीजीक महिमा सूनिकय सभकेँ समाधान भय गेल ।। 73 ।।
प्राणपति (शिवजी) केँ चरणकेँ हृदयमे धारण कय क पार्वतीजी वनमे जाकय तप करय लगलीह । पार्वतीजीक अत्यंत सुकुमारि देह तपक योग्य नहि छल, तथापियो पतिक चरणक स्मरण कय क ओ सभटा भोगकेँ तजि देलन्हि ।। 1 ।।
स्वामिक चरणमे नित्य नव अनुराग उत्पन्न होअय लागल आओर तपमे एहन मन लागल जे देहक सभटा सुधि बिसरा गेल । एक हजार वर्षधरि मूल आओर फल खयलन्हि, फेर सै वर्ष साग खाकय बितोलन्हि ।। 2 ।।
किछु दिन जल आओर बसातक भोजन कयलन्हि आओर फेर किछु दिन कठोर उपवास कयलन्हि । जे बेलपत्र सूखिकय पृथ्वीपर खसैत छल, तीन हजार वर्षधरि वएह खयलन्हि ।। 3।।
फेर सूखल पर्ण (पात) सेहो छोडि देलन्हि, तहनेँ पार्वतीक नाम ‘अपर्णणा’ भेल । तपसँ उमाक शरीर क्षीण देखिकय आकाशसँ गम्भीर ब्रम्बवाणी भेल – ।। 4।।
हे पर्वतराजक कुमारि ! सुन: , तोहर मनोहर सफल ङेलह । तूँ आब सभटा असह्य क्लेशसभकेँ (कठिन तपकेँ) त्याग: । आब तोरा शिवजी भेटथुन्ह ।। 74 ।।
हे भवानि ! धीर, मुनि आओर ज्ञानि बहुत भेल छथि, मुदा एहन (कठोर) तप कियो नहि कयलक । आब तूँ एहि श्रेष्ठ ब्रम्हाक वाणीकेँ सदा सत्य आओर निरंतर पवित्र जानिकय अपन हृदयमे धारण करह ।। 1 ।।
जहन तोहर पिता बजाबयलेल अबथुन्ह, तहन हठ छोडिकय घर चलि जईहह आओर जहन तोरा सप्तर्षि मिलथुन्ह तहन एहि वाणीकेँ ठीक बूझिहह ।। 2 ।।
[एहि तरहेँ] आकाशसँ कहल गेल ब्रम्हाक वाणीकेँ सुनतहिं पार्वतीजी प्रसन्न भय गेलीह आओर [हर्षसँ] हुनक शरीर पुलकित भय गेल । [याग्यवल्क्यजी भरद्वाजजीसँ कहलन्हि जे] हम पार्वतीक सुन्नर चरित्र सुनौलहुँ आब शिवजीक सोहनगर चरित्र सुनू ।। 3 ।।
जहनसँ सती जाकय शरीरत्याग कयलन्हि , तहनसँ मनमे वैराग्य भय गेल । ओ सदिखन श्रीरघुनाथजीक नाम जपय लगलाह आओर जतय-ततय श्रीरामचन्द्रजीक गुणक कथा सुनय लगलाह ।। 4 ।।
चिदानन्द, सुखक धाम, मोह, मद आओर कामसँ रहित शिवजी सम्पूर्ण लोककेँ आनन्द देवयबला भगवान् श्रीहरि (श्रीरामचन्द्रजी) केँ हृदयमे धारण कय (भगवान् क ध्यानमे मस्त भेल) पृथ्वीपर विचरय लगलाह ।। 75 ।।
ओ कतहुँ मुनिसभकेँ ज्ञानक उपदेश करैथ आओर कतहुँ श्रीरामचन्द्रजीक गुणक वर्णन करैत छलैथ । यद्यपि सुजान शिवजी निष्काम छथि, तइयो ओ भगवान अपन भक्त (सती)क वियोगक दु:खसँ दु:खी छथि ।। 1 ।।
एहि तरहेँ बहुत समय बीति गेल । श्राीरामचन्द्रजीक चरणमे नित नव प्रीति भय रहल अछि । शिवजीक [कठोर] नियम, [अनन्य] प्रेम आओर हुनक हृदयमे भक्तिक अटल टेककेँ [जहन श्रीरामचन्द्रजी] देखलन्हि, ।। 2 ।।
तखन कृतज्ञ [जे उपकार मानय], कृपालु, रूप आओर शीलक भण्डार, महान् तेजपुञ्ज भगवान् श्रीरामचन्द्रजी प्रकट भेलाह । ओ बहुत तरहेँ शिवजीक सराहना कयलाह आओर कहलाह जे आहाँ बिनु एहन (कठिन) व्त के निमाहि सकैत अछि ।। 3 ।।
श्रीरामचन्द्रजी बहुत तरहेँ शिवजीकेँ समझौलन्हि आओर पार्वतीजीक जन्म सुनौलन्हि । कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजी विस्तारपूर्वक पार्वतीजीक अत्यंत पवित्र करनीक वर्णन कयलन्हि ।। 4 ।।
[फेर ओ शिवजीसँ कहलन्हि-] हे शिवजी ! जौं हमरापर अपनेक स्नेह अछि तँ आब अपने हमर विनती सुनलजाय । हमरा ई माँग देलजाय जे अपने जाकय पार्वतीक संग विवाह कय लेलजाय ।। 76 ।।
शिवजी कहलन्हि- यद्यपि एना उचित नहि अछि, मुदा स्वामिक बात सेहो मेटल नहि जा सकैछ । हे नाथ ! हमर इएह परम धर्म अछि जे हम अपनेक आज्ञाकेँ माथपर राखिकय ओकर पालन करी ।। 1 ।।
माता, पिता, गुरु आओर स्वामीक बातकेँ बिनु बिचारेँ शुभ बूझिकय करय चाही ष फेर अपने तँ सभ तरहेँ हमर परम हितकारि थिकहुँ । हे नाथ ! अपनेक आज्ञा हमर माथपर अछि ।। 2 ।।
शिवजीक भक्ति, ज्ञान आओर धर्मसँ युक्त वचनरचना सुनिकय प्रभु रामचन्द्रजी सन्तुष्ट भय गेलाह । प्रभु कहलन्हि – हे हर ! अपनेक प्रतिज्ञा पूर भय गेल । आब हम जे कहलहुँ अछि ओहिकेँ हृदयमे राखब ।। 3 ।।
एहि तरहेँ कहिकय श्रीरामचन्द्रजी अन्तर्धान भय गेलाह । शिवजी हुनक ओ मूर्ति हृदयमे राखि लेलन्हि । तहनेँ सप्तर्षि शिवजी लग अयलाह । प्रभु महादेवजी हुनका अत्यंत सोहनगर वचन कहलन्हि – ।। 4 ।।
अपने लोकनि पार्वती लग जाकय हुनक प्रेमक परीक्षा लियS आओर हिमाचलकेँ कहिकय [हुनका पार्वतीकेँ लेवयलेल भेजू आ] पार्वतीकेँ घर भेजबाउ आओर हुनक संदेह दूर करू ।। 77 ।।
ऋृषिसभ [ओतय जाकय] पार्वतीकेँ केहन देखलन्हि, मुनि कहलन्हि – हे शैलकुमारि ! सुनू, आहाँ किएक एतेक कठोत तप कय रहल छी ? ।। 1 ।।
आहाँ किनक आराधना करैत छी आओर की चाहैत छी ? हमरा अपन मनक भेद किएक नहि कहैत छी ? [पार्वती कहलन्हि] बात कहैत मन बड सकुचाइत अछि । अपनेसभ हमर मुर्खता सुनिकय हँसब ।।। 2 ।।
मन हठ पकडि लेने अछि, ओ उपदेश नहि सुनैछ आओर पानिपर देवाल उठाबय चाहैत अछि । नारदजी जे कहि देलन्हि ओहिकेँ सत्य जानिकय हम बिनु पाँखिकेँ उडय चाहैत छी ।। 3 ।।
हे मुनिगण ! अपने हमर अज्ञान तँ देखियौक जे हम सदा शिवजीकेँ पति बनाबय चाहैत छी ।। 4 ।।
पार्वतीजीक बात सुनितहि ऋृषिगण हँसि पडलाह आओर कहलन्हि – आहाँक देह पर्वतेँसँ उत्पन्न भेल अछि ! भला, कहू तँ नारदत उपदेश सुनिकय आईधरि ककर घर बसल अछि? ।।78।।
ओ जाकय दक्षक पुत्रसभकेँ उपदेश देने छलाह , जाहिसँ ओ फेर घूमिकय घरक मूँहों नहि देखलन्हि । चित्रकेतुक घरकेँ नारदे चौपट कयलन्हि । फेर इएह हाल हिरण्यकशिपुक भेल ।।1 ।।
जे स्त्री-पुरुष नारदक सीख सुनैत छछथि, ओ घर -द्वार छोडिकय अवश्येँ भिखमंगा भय जाईत छथि । हुनक मन तँ कपटी अछि, देहपर सज्जनक चेन्ह अछि । ओ सभकेँ अपने जेकाँ बनाब. चाहैत छथि ।। 2 ।।
हुनक वचनपर विश्वास मानिकय आहाँ एहन पति चाहैत छी जे स्वभावेँसँ उदासीन, गुणहीन, निर्लज्ज, बेजाय वेषबला, नर-कपालक माला पहिरयबला, कुहीन, बिनु घर-द्वारक, नांगट आओर देहपर साँपसभकेँ लपेटने राखयबला अछि ।। 3 ।।
एहन वरकेँ भेटयसँ कहू, आहाँकेँ की सुख भेटत ? आहाँ ओहि ठग (नारद) केँ बहकावयमे आबिकय खूब भुललहुँ । पहिने पंचसभक कहबसँ शिव सतीसँ विवाह कयने छलाह , मुदा फेर हुनका त्यागिकय मरबा देलन्हि ।। 4 ।।
आब शिवकेँ कोनो चिन्ता नहि रहलन्हि , भीख माँगिकय खा लैत छथि आओर सुखसँ सुतैत छथि । एहन स्वभावेँसँ असगर रहयबलाक घरो भला की कहियो स्त्री टिक सकैछ ? ।। 79 ।।
आबहों हमर कहल मानू , हम आहाँकलेल नीक वर विचारलहुँ अछि । ओ बहुतेँ सुन्नर , पवित्र, सुखदायक आओर सुशील छथि, जिनक य़श आओर लीला वेद गावैत छथि ।। 1 ।।
ओ दोषसभसँ रहित, सभटा सद्गुणक राशि, लक्ष्मीक स्वामि आओर वैकुण्ठपुरीक रहन्हिहार छथि । हम एहन वरकेँ आनिकय आहासँ मिलवा देब । ई सुनितहि पार्वतीजी हँसिकय कहलन्हि – ।। 2 ।।
अपने ई सत्ते कहलहुँ जे हमर ई शरीर पर्वतसँ उत्पन्न भेल अछि । तेँ हठ नहि छूटत, शरीर भलेँ छूटि जाय । सोना सेहो पाथरेँसँ उत्पन्न होईत अछि , से ओ जरयलोसँ अपन स्वभाव (सुवर्णत्व) केँ नहि छोडैछ ।। 3 ।।
तेँ हम नारदजीक वचनकेँ नहि छोडब; चाहे घर बसय अथवा उजडय, एहिसँ हम नहि डैराइत छी । जिनका गुरूक वचनमे विश्वास नहि अछि, हुनका सुख आओओर सिद्धि सपनहुमे सुगम नहि होइछ ।। 4 ।।
मानलहुँ कि महादेवजी अवगुणसभक भवन छथि; मुदा जकर मन जाहिमे रैम गेल , ओकरा तँ ताहिसँ काज अछि ।। 80 ।।
हे मुनिश्वर ! जौं अपने पहिने भेटतहुँ , तँ हम अपनेक उपदेश सिन-माथ राखिकय सुनितहुँ । मुदा आब तँ हम अपन जन्म शिवजीक लेल हारि चुकलहुँ । फेर गुण-दोषक विचार के करय ? ।। 1 ।।


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One thought on “बालकाण्ड मैथिली भाषा अर्थ सहित

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