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इंटरनेट पर श्रीरामजी का सबसे बड़ा विश्वकोश | RamCharitManas Ramayana in Hindi English | रामचरितमानस रामायण हिंदी अनुवाद अर्थ सहित

संपूर्ण महाभारत (संस्कृत श्लोकों के हिंदी अनुवाद सहित)

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महाभारत भारतीय साहित्य की सबसे विशाल, बहुस्तरीय और बहुआयामी काव्य-परंपरा का प्रतिनिधित्व करने वाला महाकाव्य है। इसे परंपरागत रूप से वेदव्यास द्वारा रचित माना जाता है। साहित्यिक दृष्टि से महाभारत केवल एक कथा नहीं, बल्कि काव्य, दर्शन, नीति, धर्म, इतिहास और मानवीय मनोविज्ञान का अद्वितीय समन्वय है।साहित्यिक संरचना की दृष्टि से महाभारत एक महाकाव्य (Epic) है, जिसमें कथा का विस्तार अत्यंत व्यापक है। इसमें कुल लगभग 1,10,000 श्लोक हैं, जो इसे विश्व का सबसे लंबा काव्यग्रंथ बनाते हैं। इसकी भाषा मुख्यतः संस्कृत है और शैली श्लोकबद्ध तथा गद्य-पद्य मिश्रित है। महाभारत 18 पर्व और 100 उपपर्व में विभाजित है, जिनमें प्रत्येक पर्व कथा के किसी विशेष आयाम, राजनीति, युद्ध, नैतिकता, धर्म, या जीवन-दर्शन को प्रस्तुत करता है।

साहित्यिक रूप से इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसका कथानक-विस्तार और बहुस्तरीयता है। मुख्य कथा कौरवों और पांडवों के संघर्ष पर आधारित है, लेकिन इसके भीतर अनेक उपकथाएँ, आख्यान, दृष्टांत और संवाद जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि यह ग्रंथ केवल एक युद्धकथा नहीं, बल्कि मानव जीवन के विविध पक्षों का विश्वकोश बन जाता है। चरित्र-चित्रण की दृष्टि से महाभारत अत्यंत समृद्ध है। कृष्ण, अर्जुन, भीष्म, दुर्योधन जैसे पात्र केवल कथानक के अंग नहीं, बल्कि गहन मनोवैज्ञानिक और नैतिक द्वंद्वों के प्रतीक हैं। इन पात्रों के माध्यम से कर्तव्य, धर्म, लोभ, अहंकार, त्याग और मोक्ष जैसे विषयों की गहराई से पड़ताल की गई है।

महाभारत का महत्व इसके संवाद-प्रधान शैली में भी निहित है। विशेष रूप से भगवद्गीता, जो कि महाभारत का ही एक अंश है, दर्शन और काव्य का अद्वितीय संगम प्रस्तुत करती है। इसमें काव्यात्मकता के साथ-साथ दार्शनिक गूढ़ता भी देखने को मिलती है, जो इसे विश्व साहित्य में विशिष्ट स्थान प्रदान करती है। अलंकार, रस और छंद की दृष्टि से भी महाभारत अत्यंत समृद्ध है। इसमें वीर रस, करुण रस, शांत रस आदि का प्रभावी प्रयोग हुआ है। उपमा, रूपक, अनुप्रास जैसे अलंकारों के माध्यम से कथा को प्रभावशाली और सौंदर्यपूर्ण बनाया गया है। महाभारत केवल एक महाकाव्य नहीं, बल्कि मानव जीवन का दर्पण है, जिसमें व्यक्ति, समाज और धर्म के जटिल संबंधों का सूक्ष्म चित्रण मिलता है। इसकी यही व्यापकता और गहनता इसे भारतीय ही नहीं, बल्कि विश्व साहित्य की सर्वश्रेष्ठ कृतियों में स्थान दिलाती है।

महाभारत के 18 पर्वों की सूची: 

1. आदि पर्व (उपपर्व 19, अध्याय 227, श्लोक 7900)

आदि पर्व के प्रारम्भ में महाभारत के पर्वों, उपपर्वों और उनके विषयों का संक्षिप्त संग्रह है। इसमें सर्वप्रथम महर्षि उत्तंग का महात्म्य, भृगुवंश का विस्तार, नागों का वंश, कद्रू और विनता की कथा, देवों-दानवों द्वारा समुद्र मंथन, जनमेजय के सर्पसत्र की सूचना,व्यास आदि की उत्पत्ति, देवताओं के अंशावतरण, दुष्यन्त-शकुन्तला की कथा, भरत का चरित्र, ययाति के चरित्र का वर्णन, शान्तनु और गंगा की कथा, महर्षि वसिष्ठ से शापित वसुओं का भीष्म के रूप में का जन्म, भीष्म प्रतिज्ञा, कौरवों तथा पाण्डवों की उत्पत्ति, लाक्षागृह का वृत्तान्त, हिडिम्ब का वध और हिडिम्बा का विवाह, बकासुर का वध, धृष्टद्युम्न और द्रौपदी की उत्पत्ति, द्रौपदी-स्वयंवर और विवाह, पाण्डव का हस्तिनापुर में आगमन, सुन्द-उपसुन्द की कथा, नियम भंग के कारण अर्जुन का वनवास, सुभद्राहरण और विवाह, खाण्डव वन का दहन और इन्द्रप्रस्थ की स्थापना वर्णित है।

  1. अनुक्रमणिका पर्व
  2. पर्वसंग्रह पर्व
  3. पौष्य पर्व
  4. पौलोम पर्व
  5. आस्तीक पर्व
  6. अंशावतार पर्व
  7. सम्भाव पर्व
  8. जतुगृह पर्व
  9. हिडिम्बवध पर्व
  10. बकवध पर्व
  11. चैत्ररथ पर्व
  12. स्वयंवर पर्व
  13. वैवाहिक पर्व
  14. विदुरागमन राज्यलम्भ पर्व
  15. अर्जुनवनवास पर्व
  16. सुभद्राहरण पर्व
  17. हरणाहरण पर्व
  18. खाण्डवदाह पर्व
  19. मयदर्शन पर्व

2. सभा पर्व (उपपर्व 9, अध्याय 78, श्लोक 2511)

सभा पर्व में देवशिल्पी विश्वकर्मा द्वारा इन्द्रप्रस्थ का निर्माण तथा मय दानव द्वारा युधिष्ठिर के लिए सभाभवन का निर्माण, देवर्षि नारद द्वारा विभिन्न लोकपालों की सभाओं का वर्णन, देवर्षि नारद के कहने पर युधिष्ठिर द्वारा राजसूय करने का संकल्प करना, जरासन्ध की कथा तथा उसका वध, पाण्डवों की दिग्विजय यात्रा, शिशुपालवध, दुर्योधन तथा शकुनि द्वारा द्युतक्रीडा का आयोजन, युधिष्ठिर की उस द्यूत में हार और पाण्डवों का वनवास आदि वर्णित है।

  1. सभाक्रिया पर्व
  2. लोकपालसभाख्यान पर्व
  3. राजसूयारम्भ पर्व
  4. जरासन्धवध पर्व
  5. दिग्विजय पर्व
  6. राजसूय पर्व
  7. अर्घाभिहरण पर्व
  8. शिशुपालवध पर्व
  9. द्यूत पर्व
  10. अनुद्यूत पर्व

3. वन पर्व (अरण्यकपर्व) (उपपर्व 21, अध्याय 269, श्लोक 11664)

वन पर्व में पाण्डवों का वनवास, युधिष्ठिर द्वारा भगवान सूर्य से अक्षय पात्र की प्राप्ति, भीम द्वारा किर्मीर का वध, सौभविमान के स्वामी शाल्व का कृष्ण द्वारा वध, पाण्डवों की इस दशा का पता चलने पर श्रीकृष्ण का पाण्डवों से मिलना, पाण्डवों का द्वैतवन में जाना, द्रौपदी और भीम द्वारा युधिष्ठिर को उत्साहित करना, इन्द्रकीलपर्वत पर अर्जुन की तपस्या, अर्जुन का किरातवेशधारी शंकर से युद्ध, पाशुपतास्त्र की प्राप्ति, अर्जुन का इन्द्रलोक में जाना, नल-दमयन्ती-आख्यान, नाना तीर्थों की महिमा और युधिष्ठिर की तीर्थयात्रा, सौगन्धिक कमल-आहरण, जटासुर-वध, यक्षों से युद्ध, पाण्डवों की अर्जुन विषयक चिन्ता, निवातकवचों के साथ अर्जुन का युद्ध और निवातकवचसंहार, अजगररूपधारी नहुष द्वारा भीम को पकड़ना, युधिष्टिर से वार्तालाप के कारण नहुष की सर्पयोनि से मुक्ति, पाण्डवों का काम्यकवन में निवास और मार्कण्डेय ॠषि से संवाद, द्रौपदी का सत्यभामा से संवाद, घोषयात्रा के बहाने दुर्योधन आदि का द्वैतवन में जाना, गन्धर्वों द्वारा कौरवों से युद्ध करके उन्हें पराजित कर बन्दी बनाना, पाण्डवों द्वारा गन्धर्वों को हटाकर दुर्योधनादि को छुड़ाना, दुर्योधन की ग्लानी, जयद्रथ द्वारा द्रौपदी का हरण, भीम द्वारा जयद्रथ को बन्दी बनाना और युधिष्ठिर द्वारा छुड़ा देना, रामोपाख्यान, पतिव्रता की महिमा, सावित्री सत्यवान की कथा, दुर्वासा की कुन्ती द्वारा सेवा और उनसे वर प्राप्ति, इन्द्र द्वारा कर्ण से कवच-कुण्डल लेना, यक्ष-युधिष्ठिर-संवाद और अन्त में अज्ञातवास के लिए परामर्श का वर्णन है।

  1. अरण्य पर्व
  2. किर्मीरवध पर्व
  3. अर्जुनाभिगमन पर्व
  4. कैरात पर्व
  5. इन्द्रलोकाभिगमन पर्व
  6. नलोपाख्यान पर्व
  7. तीर्थयात्रा पर्व
  8. जटासुरवध पर्व
  9. यक्षयुद्ध पर्व
  10. निवातकवचयुद्ध पर्व
  11. अजगरपर्व
  12. मार्कण्डेयसमस्या पर्व
  13. द्रौपदीसत्यभामा पर्व
  14. घोषयात्रा पर्व
  15. मृगस्वप्नोद्भव पर्व
  16. ब्रीहिद्रौणिक पर्व
  17. द्रौपदीहरण पर्व
  18. जयद्रथविमोक्ष पर्व
  19. रामोपाख्यान पर्व
  20. पतिव्रतामाहात्म्य पर्व
  21. कुण्डलाहरण पर्व
  22. आरणेय पर्व

4. विराट पर्व (उपपर्व 5, अध्याय 67, श्लोक 2050)

विराट पर्व में अज्ञातवास की अवधि में विराट नगर में रहने के लिए गुप्तमन्त्रणा, धौम्य द्वारा उचित आचरण का निर्देश, युधिष्ठिर द्वारा भावी कार्यक्रम का निर्देश, विभिन्न नाम और रूप से विराट के यहाँ निवास, भीमसेन द्वारा जीमूत नामक मल्ल तथा कीचक और उपकीचकों का वध, दुर्योधन के गुप्तचरों द्वारा पाण्डवों की खोज तथा लौटकर कीचकवध की जानकारी देना, त्रिगर्तों और कौरवों द्वारा मत्स्य देश पर आक्रमण, कौरवों द्वारा विराट की गायों का हरण, पाण्डवों का कौरव-सेना से युद्ध, अर्जुन द्वारा विशेष रूप से युद्ध और कौरवों की पराजय, अर्जुन और कुमार उत्तर का लौटकर विराट की सभा में आना, विराट का युधिष्ठिरादि पाण्डवों से परिचय तथा अर्जुन द्वारा उत्तरा को पुत्रवधू के रूप में स्वीकार करना वर्णित है।

  1. पाण्डवप्रवेश पर्व
  2. समयपालन पर्व
  3. कीचक वध पर्व
  4. गोहरण पर्व
  5. वैवाहिक पर्व

5. उद्योग पर्व (उपपर्व 10, अध्याय 186, श्लोक 6698)

उद्योग पर्व में विराट की सभा में पाण्डव पक्ष से श्रीकृष्ण, बलराम, सात्यकि का एकत्र होना और युद्ध के लिए द्रुपद की सहायता से पाण्डवों का युद्धसज्जित होना, कौरवों की युद्ध की तैयारी, द्रुपद के पुरोहित ला कौरवों की सभा जाना और सन्देश-कथन, धृतराष्ट्र का पाण्डवों के यहाँ संजय को संदेश देकर भेजना, संजय का युधिष्ठिर से वार्तालाप, धृतराष्ट्र का विदुर से वार्तालाप, सनत्सुजात द्वारा धृतराष्ट्र को उपदेश, धृतराष्ट्र की सभा में लौटे हुए संजय तथा पाण्डवों का सन्देश-कथन, युधिष्ठिर के सेनाबल का वर्णन, संजय द्वारा धृतराष्ट्र को और धृतराष्ट्र द्वारा दुर्योधन को समझाना, पाण्डवों से परामर्श कर कृष्ण द्वारा शान्ति प्रस्ताव लेकर कौरवों के पास जाना, दुर्योधन द्वारा श्रीकृष्ण को बन्दी बनाने का षडयन्त्र करना, गरुड़गालवसंवाद, विदुलोपाख्यान, लौटे हुए श्रीकृष्ण द्वारा कौरवों को दण्ड देने का परामर्श, पाण्डवों और कौरवों द्वारा सैन्यशिविर की स्थापना और सेनापतियों का चयन, दुर्योधन के दूत उलूक द्वारा सन्देश लेकर पाण्डव-सभा में जाना, दोनों पक्षों की सेनाओं का वर्णन, अम्बोपाख्यान, भीष्म-परशुराम का युद्ध आदि विषयों का वर्णन है।

  1. सेनोद्योग पर्व
  2. संजययान पर्व
  3. प्रजागर पर्व
  4. सनत्सुजात पर्व
  5. यानसन्धि पर्व
  6. भगवद्-यान पर्व
  7. सैन्यनिर्याण पर्व
  8. उलूकदूतागमन पर्व
  9. रथातिरथसंख्या पर्व
  10. अम्बोपाख्यान पर्व

6. भीष्म पर्व (उपपर्व 4, अध्याय 117, श्लोक 5884)

भीष्म पर्व में कुरुक्षेत्र में युद्ध के लिए सन्नद्ध दोनों पक्षों की सेनाओं में युद्धसम्बन्धी नियमों का निर्णय, संजय द्वारा धृतराष्ट्र को भूमि का महत्व बतलाते हुए जम्बूखण्ड के द्वीपों का वर्णन, शाकद्वीप तथा राहु, सूर्य और चन्द्रमा का प्रमाण, दोनों पक्षों की सेनाओं का आमने-सामने होना, अर्जुन के युद्ध-विषयक विषाद तथा व्याहमोह को दूर करने के लिए उन्हें उपदेश (श्रीमद्भगवद्गीता), उभय पक्ष के योद्धाओं में भीषण युद्ध तथा भीष्म के वध और शरशय्या पर लेटकर प्राणत्याग के लिए उत्तरायण की प्रतीक्षा करने आदि का निरूपण है।

  1. जम्बूखण्डविनिर्माण पर्व
  2. भूमि पर्व
  3. श्रीमद्भगवद्गीता पर्व
  4. भीष्मवध पर्व

7. द्रोण पर्व (उपपर्व 8, अध्याय 170, श्लोक 8909)

द्रोण पर्व में भीष्म के धराशायी होने पर कर्ण का आगमन और युद्ध करना, सेनापति पद पर द्रोणाचार्य का अभिषेक, द्रोणाचार्य द्वारा भयंकर युद्ध, अर्जुन का संशप्तकों से युद्ध, द्रोणाचार्य द्वारा चक्रव्यूह का निर्माण, अभिमन्यु द्वारा पराक्रम और व्यूह में फँसे हुए अकेले नि:शस्त्र अभिमन्यु का कौरव महारथियों द्वारा वध, षोडशराजकीयोपाख्यान, अभिमन्यु के वध से पाण्डव-पक्ष में शोक, संशप्तकों के साथ युद्ध करके लौटे हुए अर्जुन द्वारा जयद्रथवध की प्रतिज्ञा, कृष्ण द्वारा सहयोग का आश्वासन, अर्जुन का द्रोणाचार्य तथा कौरव-सेना से भयानक युद्ध, अर्जुन द्वारा जयद्रथ का वध, दोनों पक्षों के वीर योद्धाओं के बीच भीषण रण, कर्ण द्वारा घटोत्कच का वध, धृष्टद्युम्न द्वारा द्रोणाचार्य का वध आदि का निरूपण है।

  1. द्रोणाभिषेक पर्व
  2. संशप्तकवध पर्व
  3. अभिमन्यु वध पर्व
  4. प्रतिज्ञा पर्व
  5. जयद्रथ वध पर्व
  6. घटोत्कच वध पर्व
  7. द्रोणवध पर्व
  8. नारायणास्त्रमोक्ष पर्व

8. कर्ण पर्व (उपपर्व 1, अध्याय 79, श्लोक 4964)

इस पर्व में द्रोणाचार्य की मृत्यु के पश्चात कौरव सेनापति के पद पर कर्ण का अभिषेक, कर्ण के सेनापतित्व में कौरव सेना द्वारा भीषण युद्ध, पाण्डवों के पराक्रम, शल्य द्वारा कर्ण का सारथि बनना, अर्जुन द्वारा कौरव सेना का भीषण संहार, कर्ण और अर्जुन का युद्ध, कर्ण के रथ के पहिये का पृथ्वी में धँसना, अर्जुन द्वारा कर्णवध, कौरवों का शोक, शल्य द्वारा दुर्योधन को सान्त्वना देना आदि वर्णित है।

  1. कर्णपर्व

9. शल्य पर्व (उपपर्व 2, अध्याय 59, श्लोक 3220)

कर्ण की मृत्यु के पश्चात कृपाचार्य द्वारा सन्धि के लिए दुर्योधन को समझाना, सेनापति पद पर शल्य का अभिषेक, मद्रराज शल्य का अदभुत पराक्रम, युधिष्ठिर द्वारा शल्य और उनके भाई का वध, सहदेव द्वारा शकुनि का वध, बची हुई सेना के साथ दुर्योधन का पलायन, दुर्योधन का ह्रद में प्रवेश, व्याधों द्वारा जानकारी मिलने पर युधिष्ठिर का ह्रद पर जाना, युधिष्ठिर का दुर्योधन से संवाद, श्रीकृष्ण और बलराम का भी वहाँ पहुँचना, दुर्योधन के साथ भीम का वाग्युद्ध और गदायुद्ध और दुर्योधन का धराशायी होना, क्रुद्ध बलराम को श्री कृष्ण द्वारा समझाया जाना, दुर्योधन का विलाप और सेनापति पद पर अश्वत्थामा का अभिषेक आदि वर्णित है।

  1. ह्रदप्रवेश पर्व
  2. गदा पर्व

10. सौप्तिक पर्व (उपपर्व 1, अध्याय 18, श्लोक 870)

अश्वत्थामा, कृतवर्मा और कृपाचार्य-कौरव पक्ष के शेष इन तीन महारथियों का वन में विश्राम, तीनों की आगे के कार्य के विषय में मन्त्रणा, अश्वत्थामा द्वारा अपने क्रूर निश्चय से कृपाचार्य और कृतवर्मा को अवगत कराना, तीनों का पाण्डवों के शिविर की ओर प्रस्थान, अश्वत्थामा द्वारा रात्रि में पाण्डवों के शिविर में घुसकर समस्त सोये हुए पांचाल वीरों का संहार, द्रौपदी के पुत्रों का वध, द्रौपदी का विलाप तथा द्रोणपुत्र के वध का आग्रह, भीम द्वारा अश्वत्थामा को मारने के लिए प्रस्थान करना और श्रीकृष्ण अर्जुन तथा युधिष्ठिर का भीम के पीछे जाना, गंगातट पर बैठे अश्वत्थामा को भीम द्वारा ललकारना, अश्वत्थामा द्वारा ब्रह्मास्त्र का प्रयोग, अर्जुन द्वारा भी उस ब्रह्मास्त्र के निवारण के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग, व्यास की आज्ञा से अर्जुन द्बारा ब्रह्मास्त्र का उपशमन, अश्वत्थामा की मणि लेना और अश्वत्थामा का मानमर्दित होकर वन में प्रस्थान आदि विषय इस पर्व में वर्णित है।

  1. ऐषीक पर्व

11. स्त्री पर्व (उपपर्व 3, अध्याय 27, श्लोक 775)

स्त्री पर्व में दुर्योधन की मृत्यु पर धृतराष्ट्र का विलाप, संजय और विदुर द्वारा उन्हें समझाना-बुझाना, पुन: महर्षि व्यास द्वारा उनको समझाना, स्त्रियों और प्रजा के साथ धृतराष्ट्र का युद्ध भूमि में जाना, श्री कृष्ण, पाण्डवों और अश्वत्थामा से उनकी भेंट, शाप देने के लिए उद्यत गान्धारी को व्यास द्वारा समझाना, पाण्डवों का कुन्ती से मिलना, द्रौपदी, गान्धारी आदि स्त्रियों का विलाप, व्यास के वरदान से गान्धारी द्वारा दिव्यदृष्टि से युद्ध में निहत अपने पुत्रों और अन्य योद्धाओं को देखना तथा शोकातुर हो क्रोधवश शाप देना, युधिष्ठिर द्वारा मृत योद्धाओं का दाहसंस्कार और जलांजलिदान, कुन्ती द्वारा अपने गर्भ से कर्ण की उत्पत्ति का रहस्य बताना, युधिष्ठिर द्वारा कर्ण के लिए शोक प्रकट करते हुए उसका श्राद्ध कर्म करना और स्त्रियों के मन में रहस्य न छिपने का शाप देना आदि वर्णित है।

  1. जलप्रादानिक पर्व
  2. विलाप पर्व
  3. श्राद्ध पर्व

12. शांति पर्व (उपपर्व 3, अध्याय 339, श्लोक 14732)

शान्तिपर्व में धर्म, दर्शन, राजानीति और अध्यात्म ज्ञान का विशद निरूपण किया गया है। युद्ध की समाप्ति पर युधिष्ठिर का शोकाकुल होकर पश्चाताप करना, श्रीकृष्ण सहित सभी लोगों द्वारा उन्हें समझाना, युधिष्ठिर का नगर प्रवेश और राज्याभिषेक, सबके साथ पितामह भीष्म के पास जाना, भीष्म के द्वारा श्रीकृष्ण की स्तुति, भीष्म द्वारा युधिष्ठिर के प्रश्नों का उत्तर तथा उन्हें राजधर्म, आपद्धर्म और मोक्षधर्म का उपदेश करना आदि वर्णित है। मोक्षपर्व में सृष्टि का रहस्य तथा अध्यात्म ज्ञान का विशेष निरूपण है। शान्ति पर्व में मंकगीता (अध्याय 177), “पराशरगीता” (अध्याय 290-98) तथा “हंसगीता” (अध्याय 299) भी हैं।

  1. राजधर्मानुशासन पर्व
  2. आपद्धर्म पर्व
  3. मोक्षधर्म पर्व

13. अनुशासन पर्व (उपपर्व 2, अध्याय 186, श्लोक 8000)

अनुशासन पर्व महाभारत के 18 पर्वों में से एक प्रमुख पर्व है। इसमें भीष्म के साथ युधिष्ठिर का धर्म कर्म के विषय में संवाद है। भीष्म युधिष्ठिर को नाना प्रकार से तप, धर्म और दान की महिमा बतलाते हैं और अन्त में युधिष्ठिर पितामह की अनुमति पाकर हस्तिनापुर चले जाते हैं। भीष्मस्वर्गारोहण पर्व में भीष्म के पास युधिष्ठिर का जाना, युधिष्ठिर की भीष्म से बात, भीष्म का प्राणत्याग, युधिष्ठिर द्वारा उनका अन्तिम संस्कार किए जाने का वर्णन है। इस अवसर पर वहाँ उपस्थित लोगों के सामने गंगा जी प्रकट होती हैं और पुत्र के लिए शोक प्रकट करने पर श्री कृष्ण उन्हें समझाते हैं।

  1. दान-धर्म-पर्व
  2. भीष्मस्वर्गारोहण पर्व

14. अश्वमेधिक पर्व (उपपर्व 3, अध्याय 103, श्लोक 3320)

अश्वमेधिक पर्व में महर्षि व्यास द्वारा अश्वमेध यज्ञ करने के लिए आवश्यक धन प्राप्त करने का उपाय युधिष्ठिर से बताना और यज्ञ की तैयारी, अर्जुन द्वारा कृष्ण से गीता का विषय पूछना, श्री कृष्ण द्वारा अनेक आख्यानों द्वरा अर्जुन का समाधान करना, ब्राह्मणगीता का उपदेश, अन्य आध्यात्मिक बातें, पाण्डवों द्वारा दिग्विजय करके धन का आहरण, अश्वमेध यज्ञ की सम्पन्नता, युधिष्ठिर द्वारा वैष्णवधर्मविषयक प्रश्न और श्रीकृष्ण द्वारा उसका समाधान आदि विषय वर्णित हैं।

  1. अश्वमेध पर्व
  2. अनुगीता पर
  3. वैष्णव पर्व

15. आश्रमवासिक पर्व (उपपर्व 3, अध्याय 82, श्लोक 1506)

आश्रमवासिक पर्व में भाइयों समेत युधिष्ठिर और कुन्ती द्वारा धृतराष्ट्र तथा गान्धारी की सेवा, व्यास जी के समझाने पर धृतराष्ट्र, गान्धारी और कुन्ती को वन में जाने देना, वहाँ जाकर इन तीनों का ॠषियों के आश्रम में निवास करना, महर्षि व्यास के प्रभाव से युद्ध में मारे गये वीरों का परलोक से आना और स्वजनों से मिलकर अदृश्य हो जाना, नारद के मुख से धृतराष्ट्र, गान्धारी और कुन्ती का दावानल में जलकर भस्म हो जाना सुनकर युधिष्ठिर का विलाप और उनकी अस्थियों का गंगा में विसर्जन करके श्राद्धकर्म करना आदि वर्णित है।

  1. आश्रमवास पर्व
  2. पुत्रदर्शन पर्व
  3. नारदागमन पर्व

16. मौसुलपर्व (उपपर्व 1, अध्याय 8, श्लोक 320)

इस पर्व में भगवान शिव के अवतार ऋषि दुर्वासा के शापवश साम्ब के पेट से मुसल की उत्पत्ति तथा समुद्र-तट पर चूर्ण करके फेंके गये मुसलकणों से उगे हुए सरकण्डों से यादवों का आपस में लड़कर विनष्ट हो जाना, बलराम और श्रीकृष्ण का परमधाम-गमन और समुद्र द्वारा द्वारकापुरी को डुबो देने का वर्णन है।

  1. मौसुलपर्व

17. महाप्रस्थानिक पर्व (उपपर्व 1, अध्याय 3, श्लोक 123)

इस पर्व में द्रौपदी सहित पाण्डवों का महाप्रस्थान वर्णित है। वृष्णिवंशियों का श्राद्ध करके, प्रजाजनों की अनुमति लेकर द्रौपदी के साथ युधिष्ठिर आदि पाण्डव महाप्रस्थान करते हैं, किन्तु युधिष्ठिर के अतिरिक्त सबका देहपात मार्ग में ही हो जाता है। इन्द्र और धर्म से युधिष्ठिर की बातचीत होती है और युधिष्ठिर को सशरीर स्वर्ग मिलता है।

  1. महाप्रस्थानिकपर्व

18. स्वर्गारोहण पर्व (उपपर्व 1, अध्याय 5, श्लोक 207)

इस पर्व के अन्त में महाभारत की श्रवणविधि तथा महाभारत का माहात्म्य वर्णित है। इस पर्व के प्रथम अध्याय में स्वर्ग में नारद के साथ युधिष्ठिर का संवाद और द्वितीय अध्याय में देवदूत द्वारा युधिष्ठिर को नरकदर्शन और वहाँ भाइयों की चीख-पुकार सुनकर युधिष्ठिर का वहीं रहने का निश्चय वर्णित है। तृतीय अध्याय में इन्द्र और धर्म द्वारा युधिष्ठिर को सांत्वना प्रदान की जाती है। युधिष्ठिर शरीर त्यागकर स्वर्गलोक चले जाते हैं। चतुर्थ अध्याय में युधिष्ठिर दिव्य लोक में श्रीकृष्ण और अर्जुन से मिलते हैं। पंचम अध्याय में वहीं भीष्म आदि स्वजन भी अपने पूर्व स्वरूप में मिलते है। तत्पश्चात महाभारत का उपसंहार वर्णित है।

  1. स्वर्गारोहणपर्व

खिलभाग (हरिवंशपर्व) (उपपर्व 2, श्लोक 12000)

  1. विष्णुपर्व
  2. भविष्यपर्व

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