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श्री शिव स्तुति संग्रह

Shiv Tandav Stotram Lyrics in Hindi and English | शिव तांडव स्तोत्र हिंदी अर्थ सहित

Spread the Glory of Sri SitaRam!

Shiv Tandav Stotram Lyrics in Hindi and English

परिचय (Introduction):

शिव तांडव स्तोत्र की रचना लंकापति रावण के द्वारा की गयी थी। रावण महान शिवभक्त था। उसने भगवान शिव को अपनी कठोर तपस्या से प्रसन्न करके बहुत सारे वरदान प्राप्त किये थे।

एक बार रावण अपनी शक्ति के मद में चूर होकर और भगवान के समक्ष अपनी भक्ति के प्रदर्शन के उद्देश्य से कैलाश पर्वत को अपनी भुजाओं में उठा लिया। अन्तर्यामी भगवान शिव रावण के मनोभाव को समझकर उसके अहंकार के नाश के लिए कैलाश पर्वत का भार बढ़ाने लगे जिसे रावण सहन नहीं कर सका।

तब उसे अपनी गलती का आभाष हुआ और उसने धैर्य का परिचय देते हुए क्षणमात्र में ही शिव तांडव स्तोत्र रचकर भगवान शिव को गाकर सुनाया। जिसे सुनकर भगवान शिव बहुत प्रसन्न हुए और रावण को मनोवांछित वर प्रदान किया।

यहां शिव तांडव स्तोत्र हिंदी अंग्रेजी में (Shiv Tandav Stotram Lyrics in Hindi and English) अर्थ सहित दिया जा रहा है एवं आशा है की आपको अवस्य अच्छा लगेगा;

 

शिव तांडव स्तोत्र हिंदी अंग्रेजी अर्थ सहित

 

जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्‌ ।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥1॥

jaṭāṭavīgalajjalapravāhapāvitasthale
gale’valambya lambitāṃ bhujaṃgatuṃgamālikām‌ ।
ḍamaḍḍamaḍḍamaḍḍamanninādavaḍḍamarvayaṃ
cakāra caṇḍatāṇḍavaṃ tanotu naḥ śivaḥ śivam ॥1॥

अर्थ – जिन्होंने जटारुपी अटवी (वन) से निकलती हुई गंगा जी के गिरते हुए प्रवाहों से पवित्र किये गए गले में सर्पों की लटकती हुई विशाल माला को धारण कर डमरू के डम डम शब्दों से मण्डित प्रचंड तांडव नृत्य किया, वे शिवजी हमारे कल्याण का विस्तार करें।

That Shiva, Who have long-garlands of the snake king (cobra) at the neck which is purified by the flow of trickling water-drops in the forest-like twisted hair-locks, Who danced the fierce Tandava-dance to the music of a sounding-drum, — may bless us.

 

जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-
विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्द्धनी ।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥2॥

jaṭākaṭāhasambhramabhramannilimpanirjharī-
vilolavīcivallarīvirājamānamūrddhanī ।
dhagaddhagaddhagajjvalallalāṭapaṭṭapāvake
kiśoracandraśekhare ratiḥ pratikṣaṇaṃ mama ॥2॥

अर्थ – जिनका मस्तक जटारुपी कड़ाह में वेग से घूमती हुई गंगा की चंचल तरंगों से सुशोभित हो रहा है, ललाट की अग्नि धक् धक् जल रही है, सिर पर चन्द्रमा विराजमान हैं, उन भगवान शिव में मेरा निरंतर अनुराग हो।

At every moment, may I find pleasure in Shiva, Whose head is situated in between the creeper-like unsteady waves of Nilimpanirjhari (Ganga), in whose head unsteadily fire (energy) is fuming the like twisted hair-locks, Who has crackling and blazing fire at the surface of forehead, and Who has a crescent-moon (young moon) at the forehead

 

धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर-
स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे ।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥3॥

dharādharendranandinīvilāsabandhubandhura-
sphuraddigantasantatipramodamānamānase ।
kṛpākaṭākṣadhoraṇīniruddhadurdharāpadi
kvaciddigambare mano vinodametu vastuni ॥3॥

अर्थ – गिरिराज किशोरी पार्वती के शिरोभूषण से समस्त दिशाओं को प्रकाशित होते देख जिनका मन आनंदित हो रहा है। जिनकी निरंतर कृपादृष्टि से कठिन से कठिन आपत्ति का भी निवारण हो जाता है, ऐसे किसी दिगंबर तत्व में मेरा मन आनंद प्राप्त करे।

May my mind seeks happiness in Shiva, Whose mind has the shining universe and all the living-beings inside, Who is the charming sportive-friend of the daughter of the mountain-king of the Earth ( Himalaya’s daughter parvati), Whose uninterrupted series of merciful-glances conceals immense-troubles, and Who has direction as His clothes

 

जटाभुजंगपिंगलस्फुरत्फणामणिप्रभा-
कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे ।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥4॥

jaṭābhujaṃgapiṃgalasphuratphaṇāmaṇiprabhā-
kadambakuṅkumadravapraliptadigvadhūmukhe ।
madāndhasindhurasphurattvaguttarīyamedure
mano vinodamadbhutaṃ bibhartu bhūtabhartari ॥4॥

अर्थ – जिनकी जटाओं में रहने वाले सर्पों के फणों की मणियों का फैलता हुआ प्रभापुंज दिशा रुपी स्त्रियों के मुख पर कुंकुम का लेप कर रहा है। मतवाले हाथी के हिलते हुए चमड़े का वस्त्र धारण करने से स्निग्ध वर्ण हुए उन भूतनाथ में मेरा चित्त अद्भुत आनंद करे।

May my mind hold in Shiva, by Whom — with the light from the jewels of the shining-hoods of creeper-like yellow-snakes — the face of Dikkanyas’ are smeared with Kadamba-juice like red Kuńkuma, Who looks dense due to the glittering skin-garment of an intoxicated elephant, and Who is the Lord of the ghosts

 

सहस्त्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर-
प्रसूनधूलिधोरणीविधूसराङ्घ्रिपीठभूः ।
भुजंगराजमालया निबद्धजाटजूटकः
श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥5॥

sahastralocanaprabhṛtyaśeṣalekhaśekhara-
prasūnadhūlidhoraṇīvidhūsarāṅghripīṭhabhūḥ ।
bhujaṃgarājamālayā nibaddhajāṭajūṭakaḥ
śriyai cirāya jāyatāṃ cakorabandhuśekharaḥ ॥5॥

अर्थ – जिनकी चरण पादुकाएं इन्द्र आदि देवताओं के प्रणाम करने से उनके मस्तक पर विराजमान फूलों के कुसुम से धूसरित हो रही हैं। नागराज के हार से बंधी हुई जटा वाले वे भगवान चंद्रशेखर मुझे चिरस्थाई संपत्ति देनेवाले हों।

For a long time, may Shiva — Whose foot-basement is grey due to the series of pollen dust from flowers at the head of Indra (Sahasralocana) and all other demi-gods, Whose matted hairlocks are tied by a garland of the king of snakes, and Who has a head-jewel of the friend of cakora bird — produce prosperity

 

ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा-
निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम्‌ ।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपालि सम्पदे शिरो जटालमस्तु नः ॥6॥

lalāṭacatvarajvaladdhanañjayasphuliṅgabhā-
nipītapañcasāyakaṃ namannilimpanāyakam‌ ।
sudhāmayūkhalekhayā virājamānaśekharaṃ
mahākapāli sampade śiro jaṭālamastu naḥ ॥6॥

अर्थ – जिन्होंने ललाट वेदी पर प्रज्वलित हुई अग्नि के तेज से कामदेव को नष्ट कर डाला था, जिनको इन्द्र नमस्कार किया करते हैं। सुधाकर (चन्द्रमा) की कला से सुशोभित मुकुट वाला वह उन्नत विशाल ललाट वाला जटिल मस्तक हमें संपत्ति प्रदान करने वाला हो।

May we acquire the possession of tress-locks of shiva, Which absorbed the five-arrows (of Kaamadeva) in the sparks of the blazing fire stored in the rectangular-forehead, Which are being bowed by the leader of supernatural-beings, Which have an enticing-forehead with a beautiful streak of crescent-moon

 

करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-
द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके ।
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक-
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥7॥

karālabhālapaṭṭikādhagaddhagaddhagajjvala-
ddhanañjayāhutīkṛtapracaṇḍapañcasāyake ।
dharādharendranandinīkucāgracitrapatraka-
prakalpanaikaśilpini trilocane ratirmama ॥7॥

अर्थ – जिन्होंने अपने विकराल ललाट पर धक् धक् जलती हुई प्रचंड अग्नि में कामदेव को भस्म कर दिया था। गिरिराज किशोरी के स्तनों पर पत्रभंग रचना करने के एकमात्र कारीगर उन भगवान त्रिलोचन में मेरा मन लगा रहे।

May I find pleasure in Trilocana, Who offered the five great-arrows (of Kamadeva) to the blazing and chattering fire of the plate-like forehead, and Who is the sole-artist placing variegated artistic lines on the breasts of the daughter of Himalaya (Parvati).

 

नवीनमेघमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फुर-
त्कुहूनिशीथिनीतमःप्रबन्धबद्धकन्धरः ।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः ॥8॥

navīnameghamaṇḍalīniruddhadurdharasphura-
tkuhūniśīthinītamaḥprabandhabaddhakandharaḥ ।
nilimpanirjharīdharastanotu kṛttisindhuraḥ
kalānidhānabandhuraḥ śriyaṃ jagaddhurandharaḥ ॥8॥

अर्थ – जिनके कंठ में नवीन मेघमाला से घिरी हुई अमावस्या की आधी रात के समय फैलते हुए अंधकार के समान कालिमा अंकित है। जो गजचर्म लपेटे हुए हैं, वे संसार भार को धारण करने वाले चन्द्रमा के समान मनोहर कांतिवाले भगवान गंगाधर मेरी संपत्ति का विस्तार करें।

May Shiva — Whose cord-tied neck is dark like a night with shining-moon obstructed by a group of harsh and new clouds, Who holds the River Ganga, Whose cloth is made of elephant-skin, Who has a curved and crescent moon placed at the forehead, and Who bears the universe — expand [my] wealth.

 

प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा-
वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम्‌ ।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥9॥

praphullanīlapaṅkajaprapañcakālimaprabhā-
valambikaṇṭhakandalīruciprabaddhakandharam‌ ।
smaracchidaṃ puracchidaṃ bhavacchidaṃ makhacchidaṃ
gajacchidāndhakacchidaṃ tamantakacchidaṃ bhaje ॥9॥

अर्थ – जिनका कंठ खिले हुए नील कमल समूह की श्याम प्रभा का अनुकरण करने वाली है तथा जो कामदेव, त्रिपुर, भव (संसार), दक्षयज्ञ, हाथी, अन्धकासुर और यमराज का भी संहार करने वाले हैं, उन्हें मैं भजता हूँ।

I adore Shiva, Who supports the dark glow of blooming blue lotus series at around the girdle of His neck, Who cuts-off Smara (Kamadeva), Who cuts-off Pura, Who cuts-off the mundane existence, Who cuts-off the sacrifice (of Daksa), Who cuts-off the demon Gaja, Who cuts-off Andhaka, and Who cuts-off Yama (death).

 

अखर्वसर्वमंगलाकलाकदम्बमञ्जरी-
रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम्‌ ।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥10॥

akharvasarvamaṃgalākalākadambamañjarī-
rasapravāhamādhurīvijṛmbhaṇāmadhuvratam‌ ।
smarāntakaṃ purāntakaṃ bhavāntakaṃ makhāntakaṃ
gajāntakāndhakāntakaṃ tamantakāntakaṃ bhaje ॥10॥

अर्थ – जो अभिमान रहित पार्वती जी के कलारूप कदम्ब मंजरी के मकरंद स्रोत की बढ़ती हुई माधुरी के पान करने वाले भँवरे हैं तथा कामदेव, त्रिपुर, भव, दक्षयज्ञ, हाथी, अन्धकासुर और यमराज का भी अंत करनेवाले हैं, उन्हें मैं भजता हूँ।

I adore Shiva, Who only eats the sweet-flow of nectar from the beautiful flowers of Kadamba-trees which are the abode of all important auspicious qualities, Who destroys Smara (Kamadeva), Who destroys Pura, Who destroys the mundane existence, Who destroys the sacrifice (of Dakṣa), Who destroys the demon Gaja, Who destroys Andhaka, and Who destroys Yama (death).

 

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजंगमश्वस-
द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट् ।
धिमिद्धिमिद्धिमिद्ध्वनन्मृदंगतुंगमंगल-
ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः ॥11॥

jayatvadabhravibhramabhramadbhujaṃgamaśvasa-
dvinirgamatkramasphuratkarālabhālahavyavāṭ ।
dhimiddhimiddhimiddhvananmṛdaṃgatuṃgamaṃgala-
dhvanikramapravartitapracaṇḍatāṇḍavaḥ śivaḥ ॥11॥

अर्थ – जिनके मस्तक पर बड़े वेग के साथ घूमते हुए साँपों के फुफकारने से ललाट की भयंकर अग्नि क्रमशः धधकती हुई फैल रही है। धीमे धीमे बजते हुए मृदंग के गंभीर मंगल स्वर के साथ जिनका प्रचंड तांडव हो रहा है , उन भगवान शंकर की जय हो।

May Shiva, Whose dreadful forehead has oblations of plentiful, turbulent and wandering snake-hisses — first coming out and then sparking, Whose fierce tandava-dance is set in motion by the sound-series of the auspicious and best-drum (damaru) — which is sounding with ‘dhimit-dhimit’ sounds, be victorious.

 

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंगमौक्तिकस्त्रजो-
र्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम् ॥12॥

dṛṣadvicitratalpayorbhujaṃgamauktikastrajo-
rgariṣṭharatnaloṣṭhayoḥ suhṛdvipakṣapakṣayoḥ ।
tṛṇāravindacakṣuṣoḥ prajāmahīmahendrayoḥ
samapravṛttikaḥ kadā sadāśivaṃ bhajāmyaham ॥12॥

अर्थ – पत्थर और सुन्दर बिछौनों में, सांप और मोतियों की माला में, बहुमूल्य रत्न और मिटटी के ढेले में, मित्र या शत्रु पक्ष में, तिनका या कमल के समान आँखों वाली युवती में, प्रजा और पृथ्वी के राजाओं में समान भाव रखता हुआ मैं कब सदाशिव को भजूँगा ?

When will I adore Sada Shiva with an equal vision towards varied ways of the world, a snake or a pearl-garland, royal-gems or a lump of dirt, friend or enemy sides, a grass-eyed or a lotus-eyed person, and common men or the king.

 

कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्‌
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन्‌ ।
विलोललोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मन्त्रमुच्चरन्‌ कदा सुखी भवाम्यहम्‌ ॥13॥

kadā nilimpanirjharīnikuñjakoṭare vasan‌
vimuktadurmatiḥ sadā śiraḥsthamañjaliṃ vahan‌ ।
vilolalolalocano lalāmabhālalagnakaḥ
śiveti mantramuccaran‌ kadā sukhī bhavāmyaham‌ ॥13॥

अर्थ – सुन्दर ललाट वाले भगवान चन्द्रशेखर में मन को एकाग्र करके अपने कुविचारों को त्यागकर गंगा जी के तटवर्ती वन के भीतर रहता हुआ सिर पर हाथ जोड़ डबडबाई हुई विह्वल आँखों से शिव मंत्र का उच्चारण करता हुआ मैं कब सुखी होऊंगा ?

Living in the hollow of a tree in the thickets of River Ganga, always free from ill-thinking, bearing anjali at the forehead, free from lustful eyes, and forehead and head bonded, when will I become content while reciting the mantra ‘‘Shiva?’’

 

निलिम्पनाथनागरी कदंबमौलिमल्लिका
निगुम्फनिर्भरक्षन्मधूष्णीकामनोहरः
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनीमहर्निशम्
परश्रियं परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥14॥

nilimpanāthanāgarī kadaṃbamaulimallikā
nigumphanirbharakṣanmadhūṣṇīkāmanoharaḥ
tanotu no manomudaṃ vinodinīmaharniśam
paraśriyaṃ paraṃ padaṃ tadaṃgajatviṣāṃ cayaḥ ॥14॥

अर्थ – देवांगनाओं के सिर में गुंथे कदम्ब के पुष्पों की मालाओं के झड़ते सुगन्धित पराग से मनोहर, शोभा के धाम महादेव के अंगों की सुंदरता आनंदयुक्त हमारे मन की प्रसन्नता को सदा बढ़ाती रहे।

Divine beauty of different parts of Lord Shiv which are enlighted by fragrance of the flowers decorating the twisted hairlocks of angles may always bless us with happiness and pleasure.

 

प्रचंडवाडवानलप्रभाशुभप्रचारिणी
महाष्टसिद्धिकामिनीजनावहूत जल्पना
विमुक्तवामलोचनो विवाहकालिकध्वनिः
शिवेति मन्त्रभूषणो जगज्जजयाय जायताम्॥15॥

pracaṃḍavāḍavānalaprabhāśubhapracāriṇī
mahāṣṭasiddhikāminījanāvahūta jalpanā
vimuktavāmalocano vivāhakālikadhvaniḥ
śiveti mantrabhūṣaṇo jagajjajayāya jāyatām॥15॥

अर्थ – बड़वानल (समुद्र की अग्नि) की भांति पापों को भस्म करने में स्त्री स्वरूपिणी अणिमादिक अष्ट महासिद्धियों और चंचल नेत्रों वाली देवकन्याओं से शिव विवाह समय में गान की गयी मंगल ध्वनि सब पर मन्त्रों में श्रेष्ठ शिव मन्त्र से परिपूर्ण होकर हम सांसारिक दुखों को नष्ट कर विजय पाएं।

The Shakti (energy) which is capable of burning all the sins and spreading welfare of all and the pleasent sound produced by angles during enchanting the pious Shiv mantra at the time of Shiv-Parvati Vivah may winover & destroy all the sufferings of the world.

 

इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन् स्मरन् ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति सन्ततम्‌ ।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशंकरस्य चिन्तनम् ॥16॥

imaṃ hi nityamevamuktamuttamottamaṃ stavaṃ
paṭhan smaran bruvannaro viśuddhimeti santatam‌ ।
hare gurau subhaktimāśu yāti nānyathā gatiṃ
vimohanaṃ hi dehināṃ suśaṃkarasya cintanam ॥16॥

अर्थ – जो मनुष्य इस उत्तमोत्तम स्तोत्र का नित्य पाठ, स्मरण और वर्णन करता है, वह सदा शुद्ध रहता है और शीघ्र ही भगवान शंकर की भक्ति प्राप्त कर लेता है। वह विरुद्ध गति को प्राप्त नहीं करता क्योंकि शिव जी का ध्यान चिंतन मोह का नाश करने वाला है।

Reading, remembering, and reciting this eternal, having spoken thus, and the best among best eulogy indeed incessantly leads to purity. In preceptor Hara (Shiva) immediately the state of complete devotion is achieved; no other option is there. Just the thought of Shiva (Shankara) is enough for the people.

 

पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं
यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे ।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरंगयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥17॥

pūjāvasānasamaye daśavaktragītaṃ
yaḥ śambhupūjanaparaṃ paṭhati pradoṣe ।
tasya sthirāṃ rathagajendraturaṃgayuktāṃ
lakṣmīṃ sadaiva sumukhīṃ pradadāti śambhuḥ ॥17॥

अर्थ – सायंकाल में पूजा समाप्त होने पर जो रावण के गाये हुए इस शिव तांडव स्तोत्र ( Shiv Tandav Stotram ) का पाठ करता है, भगवान शंकर उस मनुष्य को रथ, हाथी, घोड़ों से युक्त सदा स्थिर रहने वाली संपत्ति प्रदान करते हैं।

At the time of prayer-completion, that who reads this song by Dasavaktra (Ravana) after the prayer of Sambhu — Sambhu gives him stable wealth including chariots, elephants and horses, and beautiful face.

 

॥ इति श्री रावणकृतामशिवताण्डव स्तोत्रम संपूर्णं॥

 iti śrī rāvaṇakṛtāmaśivatāṇḍava stotrama saṃpūrṇaṃ

Thus ends the prayer of the dancing Shiva, Composed by Ravana.

॥ शिव तांडव स्तोत्र समाप्त॥

śiva tāṃḍava stotra samāpta


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Shiv

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